आखिर शब्द कहाँ हैं वे
हम उस देश के वासी हैं
जहाँ शब्द गरिमा पाते हैं
शब्दों की अस्मिता हेतु हम
सर्वस्व न्यौछावर कर जाते हैं
शस्त्र जिसे कर सके नहीं
शब्दों ने कर दिखलाया है
शब्दों के महज संयोजन ने
नव इतिहास रचाया है
आखिर शब्द कहाँ हैं वे
जो नृप को बन भिजवाते थे
शब्द हेतु योद्धा रण में
हरि को शस्त्र गहाते थे
शब्द,आखिर कहाँ हैं वे
जो इतना जूनून भर जाते थे
पत्नी, पुत्र सहित भूपति खुद,
शब्दों की खातिर बिक जाते थे
आखिर शब्द कहाँ वे
जो असंभाव्य करवाते थे
सामान्य पुरुष को प्रेरित
कर महाग्रन्थ रचवाते थे
भुला रहे अब अपनी संस्कृति
कुछ भी अनर्गल कह जाते है
और, दूसरे क्षण ही उसको
लज्जा छोड़, निगल जाते हैं
ये मूल्य नहीं हैं वो जिन पर
हम होते रहे सदा गर्वान्वित
ये अवनति के प्रथम चिन्ह हैं
परिलक्षित जिनमे अनहित
क्यों न विवेक से मंथन कर
हम पहले सोचें फिर तोलें
अहम् भाव से प्रेरित हो
क्यों निन्दनीय अप्रिय बोलें
श्रीप्रकाश शुक्ल

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