अनपढ़ी किताब
जो स्वप्नं सजाये जीवन में बिखर गये सब तिनके तिनके
जो दम भरते थे अपनों का छुड़ा ले गये सभी सिलसिले
जब पृष्ठ पलटता हूँ अतीत के लगता जैसे अनपढ़ी किताब
आहत दिखते हैं हर पन्ने पर टूटे फूटे अध जले ख़्वाब
कुछ एहसास अधूरे से रुक रुक कर सुधि में आ जाते हैं
हो कितनी भी मन की स्थिरता आँसू दो टपका जाते हैं
सोचा कितनी बार महज़ मन की ये इक ऐसी दुर्बलता है
जिसमें कोइ सार नहीं है, भ्रामक है, के वल दुःख पलता है
जीवन की सच्ची रीति यही है, पन्ने केवल आगे पलटो
नयी कल्पनायें सवाँर कर नया कथानक फिर से चुन लो
जिनके होते संकल्प सुदृढ़ नापते परिधि असमानों की
उड़ते हैं निर्भीक गगन में , भर चाहत, नये ठिकानों की
श्रीप्रकाश शुक्ल

No comments:
Post a Comment