सारी धरा ही आज प्यासी
दिखती नहीं तदवीर कोई जालिमों के कृत्य आगे
पलती नहीं है अब दिलों में दया की अनुभूति कोई
मर चुकी वो आत्मा जो, मासूमियत के वक्ष दागे
सार्वभौमिक मूल्य के संकल्प ले कर हम चले थे
दुर्भावना ने तोड़ डाले, प्रीति के सुकुमार धागे
कितने निर्मम कृत्य इनके देख सारा जग डरा है
फैला रखा आतंक ऐसा जो सक्षम थे भय से भागे
इस खूंखार राक्षस को मिटाना हैं नहीं बश एक के
अब घडी वो आ गयी "श्री " त्याग निद्रा विश्व जागे
श्रीप्रकाश शुक्ल

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