इस पनघट पर तो
भारत है इक मात्र देश सरिताएँ जहां पाप क्षरतीं हैं
इनके घाटों पर भक्तों की निष्ठाएँ नर्तन करतीं हैं
घाट सभी पूजास्थल हैं ,अतुल सौम्यता के अनुरूपक
जल में बिंबित रवि किरणें, मन की अस्थिरता हरतीं हैं
आस पास की नगर मानुषीं, जब इन घाटों पर आतीं हैं
तिरछी अटकीं मटकियां कमर पर छटा दिव्य सी भरतीं हैं
लगता है इस पनघट पर तो साक्षात अप्सराएं उतरीं हैं
जिनकी मधुर हंसी में, नव पुष्पित पंखुरियां झरतीं हैं
ये रुचिर घाट भारत के "श्री "भारत की जीवन रेखा हैं
इन पर निर्भर गतिविधियाँ ही असली कथा बयां करतीं हैं
श्रीप्रकाश शुक्ल

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