तोड़कर बंधन
तोड़कर बंधन अगर तुम चाहते बाहर निकलना,
तो जरूरी जानना होगा तुम्हें बांधे हुए क्या है ।
जीव अपने आप में है पूर्णतः बंधन रहित ,
जब तलक अस्तित्व अपना देह से रखता जुदा है ॥
संभव नहीं मानव, जगत में रह सके निर्लिप्त हो,
अनुबंध माया मोह के अनिवार्यतः रखते जकड ।
ऐसी दलदल से स्वयं को खींचना बाहर अगम,
व्यर्थ होतीं कोशिशें, और भी मज़बूत हो जाती पकड़ ॥
भाव कर्ता का भुला , समभाव हो हर द्वनद में,
चित्त को एकाग्र कर ,यदि व्यवस्थित कर सको ।
तो ये संभव है कि हो उन्मुक्त सारे बंधनों से ,
अर्थ जीवन का सही साकार भी तुम कर सको ॥
श्रीप्रकाश शुक्ल

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