रूप अपना देखा करती है
नर नारी के प्रणय पाश में रही युगों से रीति यही
एकाधिकार की चाहत हर नारी मन में रहती है
नर भी यदि संयम साध निभा पाये जो नारी वृत
तो फिर जीवन नदिया कल कल स्वर भर बहती है
गोपियाँ जभी यमुना सरि पर जल भरने जातीं,
राधा नित तट पर बैठ रूप अपना देखा करती है
सोचा करती है जब मैं इतनी रूपवान हूँ सुंदर हूँ
क्यों कान्हां की दृष्टि मेरी सखियों पर पड़ती है
राधा को चिंतित देख स्वयं कान्हां ने कहा सुनो राधे,
ऐसा संशय व्यर्थ पाल क्यों मन में दुःख भरती हो
हम सब से, सब हमसे, रखते अनुराग एक सा ही
एक तुम्ही हो, जाने क्यों स्नेह अपरिमित करती हो
हम आये हैं इस धरती पर ये भी पाठ सिखाने जग को
प्रेम, कामना रहित रहे यदि, खूब फूलता फलता है
जीवन अभिरम्य रंगशाला बन नाना रूप अंक भर लेता
अनुरक्ति कलित पथ पर, जीवन रथ सज कर चलता है
श्रीप्रकाश शुक्ल

No comments:
Post a Comment