जिंदगी की वाटिका में
जिंदगी जीने चला था सिर्फ़ सुख की चाह लेकर
यह कभी सोचा नहीं हर गुल को कांटे घेरते हैं
जिंदगी होती नही है पुष्प सज्जित सेज केवल
हर लम्हे को नियति के अंकुश अवसि ही फेरते हैं
कितने झंझावात आये, जिंदगी की वाटिका में
भयभीत हो आश्रय हिले, कांपे, मगर टूटे नहीं
आस्था की जड़ें भी कँपकपायीं, बार कितनी
पर संकल्प जो थे साध रक्खे वो कभी छूटे नहीं
मानते अनुराग ही है, सुख दुःख का जन्म दाता,
पर मात्र देता कष्ट ही, अनुराग जो भौतिक रहा
जो समर्पण कर सका पूरा, जगत के ईश को
हर बृक्ष उसका जिंदगी के बाग़ में पुष्पित रहा
जिंदगी उसके लिए इक भार होकर रह गयी है
सीखा नहीं कुछ पेड़ से, जो खड़ा बगिया में रहा
रात दिन जिसने लुटाये फूल पत्ती फल खुले दिल
अंत में हो खुद समर्पित कर्म निज करता रहा
अब भी समय है चेत जा जिंदगी की कर समीक्षा
नूर की किरणें तुम्हारी कर रहीं प्रतिपल प्रतीक्षा
दूसरों के प्रति सदाशयता का नाता जोड़ कर चल
भटके हुये हैं डगर जो,उनका पथ तू मोड़ कर चल
श्रीप्रकाश शुक्ल

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