कौन मन के दर्पण में
देह आत्मा के बंधन को त्रिगुण सदा संचालित करते
गुणानुसार मानवीय प्रकृति में खट्टे मीठे रस भरते
किसी तरह चलती थी नौका धीरे से हिचकोले लेती
जीवन के नियत पड़ावों को छूती रूकती संबल देती
अरे कौन मन के दर्पण में सहसा आज हुआ प्रतिबिंबित
अनुभूति प्रेम की सहज उठी अंतस हो उठा स्वयं दीपित
करुणा के अंकुर फूट पड़े, पर सेवा भाव हुआ विकसित
हृद सागर शांत प्रशांत हुआ, लहर ज्ञान की उद्वेलित
ये कृपा दृष्टि है प्रभु की, या फिर निखरे पुण्य विगत के
या रज, तम को कर निरस्त, सत गुण हावी हुए उछलके
जो भी हो आराद्ध्य हमारे आज मेरे मन मंदिर में स्थित
जिनको बिन देखे रहे विकल और राह जोहते हुए व्यथित
श्रीप्रकाश शुक्ल

No comments:
Post a Comment