Thursday, 23 May 2013

प्राण ही शब्दित हुये

डूबती नैया फंसी , जब भी किसी मझधार में 
प्राण ही शब्दित हुये, हर एक आर्त पुकार में 

द्रोपदी ने कृष्ण को, आवाज़ दी जब हो विवश
दौड़े चले आये  कन्हैया, अनुनीतता के भार में 

गज ने पुकारा ईश को, जब प्राण संकट में फंसे,
प्राण ही शब्दित हुए थे ,प्राण घातक  रार में 

प्रहलाद ने हर यातना , नित्य हंस हंस कर सही, 
थी समाहित राम निष्ठा, सांस की हर धार में 

जपता रहा था  नाम उल्टा, अर्थ समझे ही बिना ,
पर प्राण तो शब्दित रहे, उस दस्यु की  गुहार में  

शब्द है बस एक ध्वनि, संवेदना मुखरित करे जो,
प्राण जब शब्दित बनें  तो  सार हो  उदगार  में 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

1 comment:

  1. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 07-06-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।


    जय हिंद जय भारत...

    कुलदीप ठाकुर...

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