Tuesday, 23 April 2013


केसरिया लाल पीला, नीला हरा गुलाबी.

आया होली का त्यौहार,घर घर गूँज उठी ये बोली 

छोडो छुटपुट खटपट भैया जो हो ली  सो हो ली 


सभी रंग के संग हमारे, बढ़कर एक एक से प्यारे

आओ मिलकर नाचें गायें रंग रास के बन हमजोली 


नीला हरा गुलाबी.पीला, रंग भर अंग केसरिया लाल

प्रकृति सुंदरी नाच रही है,नचें साथ पशु पंछी टोली 
   

तनकर खड़े हुए गेहूं जौ,रोज सोचते हैं मन ही मन

मटर सयानी मदमाती मन, पाऊँ कैसे इसकी डोली 


हर मानव का धर्म यही है जियें प्यार से अरु जीने दें

जीने की इक राह दिखाता,हंसी ख़ुशी का ढंग है होली  


''होली की हार्दिक शुभकामनाएं''   

श्रीप्रकाश शुक्ल 

केसरिया लाल पीला , नीला हरा गुलाबी 

केसरिया  लाल   पीला , नीला  हरा   गुलाबी 
पहिन पजामा कुरता ढीला घर से चला शराबी 

बात पते की कहता जो वो, हम सब को बतलाते हैं 
पीने वाले पीकर के, मदहोशी में खो जाते हैं 

जो मदहोशी में खो जाते हैं, वो जल्दी  सो जाते हैं 
और सोनेवाले जीव कोई भी ,पाप नहीं कर पाते हैं 

पाप  नहीं  करते  हैं जो, वो सीधे स्वर्ग चले जाते हैं 
इसीलिए पी के क्यों  न हम,  स्वर्ग द्वार खुलवाते हैं 

पूछा है ये  सब, ऊपरवाले से,  लिखकर पत्र जबाबी 
ये राज़ उसी ने बतलाया है, कुछ भी नहीं किताबी 

''होली की हार्दिक शुभकामनाएं''

श्रीप्रकाश शुक्ल 

कहानी कभी फिर सुनाना

कालिमा से पुते चित्र, हैं साथ इतने, संभव नहीं है इन्हें भूल जाना  
 कोई नहीं अब भरोसा करेगा, ये झूठी कहानी कभी फिर सुनाना  


नियति के थपेड़ों से होकर के आहत, सुध खो चुके हैं विहग सब चमन के  
प्रीति की डोर इतनी लचर हो गयी है, बिखर से गए सारे अनुबंध मन के  
न हृदयों की थाली में सजता वो धागा, जो बांधे रहा है युगों से सभी को 
जन जन के मन में भरे प्रेम रस जो, पुरवा मलय की न लाती सुरभि वो 

विगत वर्ष पैंसठ से सुनते रहे हम, बदलेगा मौसम बनेगा सुहाना  
कोई नहीं अब भरोसा करेगा, ये झूठी कहानी कभी फिर सुनाना  

वादे किये थे मिटेगी विषमता, हट सकेगा सदा के लिए दुःख का रोदन  
मेहनत की रोटी सभी खा सकेंगे, न छीनेगा कोई किसी का भी भोजन  
भूखी चितवन खड़ी देख के पार्श्व में, चीर देता है मन एक अनजाना भय  
परियोजनायें सकल रेत की भीत सी, कोई युक्ति न सूझे जो बदले समय 

जब भरा हो दिल में धुंआ द्वेष गहरा, दुष्कर है तब प्रीति के गीत गाना    
कोई नहीं अब भरोसा करेगा, ये झूठी कहानी कभी फिर सुनाना  

श्रीप्रकाश शुक्ल 



होली खेलत रे नंद लाल

होली खेलत रे नंद लाल जमुन  तट होली खेलत रे 
बरसाने में पहुँच गए सब जोर जोर ग्वालिन टेरत रे 

सांठ गाँठ सखियन में है रहि पकरों आज नन्द को छोरो 
लाल गुलाल गालन पै मलहों  करिहों  कारे तै  गोरो 
कान्हा चीनत सगरी चतुराई, कोई नाहि बच है अज कोरो 
दधि मट किन् में रंग भरावत साथ में कीचर घोरो 

ग्वालवाल समुझाय दये हैं लपक झपक सब घेरत रे    
होली खेलत रे नंद लाल जमुन तट होली खेलत रे 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Thursday, 21 March 2013


समय की शिला पर 

समय की शिला पर हैं कुछ चित्र अंकित ,   
   आज के युग में जो भ्रान्ति फैला रहे हैं 
        औचित्य जिनका न कुछ शेष दिखता 
            चलना गतानुगति ही सिखला रहे हैं  

साधन नहीं थे कोई आधुनिक जब, 
    रीते ज़हन को जो करते सुचालित  
      चित्र अंकित किये कल्पना में जो सूझे  
         कोई था न अंकुश जो करता नियंत्रित 

दायित्व है अब, नए चिंतकों का 
     आगे आयें, समीक्षा करें मूल्यवादी 
          तत्व जो बीज बोते, असमानता का 
                मिटायें उन्हें  हैं जो जातिवादी 

हैं कुछ मूल्य, जो मापते अस्मिता को 
     व्यक्ति के वर्ण और देह के रंग से   
          लिंग भेद को ,कुछ न भूले अभी भी 
             कलुष ही बिछाया विकृत सोच संग से   
  
समय आगया है हटायें ये पन्ने 
    लिखें वो भाषा जो सब को समेटे 
        विकासोन्मुखी हों, नीतियाँ हमारी 
           समय की शिला पर पड़े धब्बे मेंटे   
              
 श्रीप्रकाश शुक्ल 


बोल हैं कि वेद की ऋचाएं हैं 

तुलसी के मानस में झाँक कर देखा आज, 
   पत्नी वियोग में भगवान राम रोते हुए  
        पूछते लताओं से सीते को देखा क्या, 
           तुमसे कुछ कह सकी धैर्य को संजोते हुए  

 सागर की  महिमा को राघव ने मान दिया 
   सरिता तट जाकर सरयू को प्रणाम किया 
      गोबर्धन पूजा करते, सूर्य को चढ़ाते अर्घ्य 
         भारत ने सदा ही प्रकृति मय जीवन जिया 

प्रकृति को मानते हैं पुरुष की जननी सभी 
   भारत में मानते है माँ सामान पूज्या 
     पोषण भरण जो करती रही स्वार्थ रहित 
       जन जन के ह्रदय में रही बन के आराध्या 
              
प्रकृति के उपकार सकल स्वीकारते हैं, 
 पच्छिमी  भी,संज्ञा दे,  कहते हैं कार्बन ऋण 
      रचते उपक्रम अनेक, जैसे भी होसके 
          प्रकृति के औदार्य से हो सकें सब उऋण  

भारत के चिंतकों की बात ही अनूठी सी 
  लोक गीत, ग्रन्थों भरी जो अभिव्यंजनायें हैं   
     कितना ही प्रयास करो समझ नहीं पाओगे 
          अनुभूतियों के बोल हैं कि वेद की ऋचाएं हैं 

श्रीप्रकाश शुक्ल 


Tuesday, 12 February 2013

तेरी वीणा की झंकारें 

कब से नहीं सुनी  माँ , तेरी  वीणा की झनकारें 
भक्ति भाव से पूरित दृग माँ,इकटक तुझे निहारें

बचपन में निशदिन ही  तू माँ, साथ हमारे रहती थी
सा माँ पातु  सरस्वति ,जिभ्या रोज सकारे कहती थी
अध्ययन के पहले पहले, गुणगान  तुम्हारा करते थे
सद विचार, शुभ संस्कार  नित चित वृति में भरते थे

कितनी करुणा रहित हुयी माँ, सुनती नहीं पुकारें
मन  व्याकुल  सुनने  को  तेरी वीणा की झनकारें

हम बच्चे हैं अज्ञानी हैं , भिक्षुक ममतामयी  दृष्टि के
युगों युगों  से हम आकांक्षी विद्या ज्ञान कला वृष्टि के  
शिशु बालक अरु प्रौढ़ तरुण हम सब ही तेरे उपासक हैं
तेरी वीणा के मधुरिम स्वर अज्ञान तिमिर के नाशक हैं

माँ  तेरे पद रज के कण, अनगिन शठ, मूढ़ उबारें
हैं  मृदु  शान्ति प्रदायिनि, तेरी  वीणा की झनकारें


श्रीप्रकाश शुक्ल