Tuesday, 23 April 2013

होली खेलत रे नंद लाल

होली खेलत रे नंद लाल जमुन  तट होली खेलत रे 
बरसाने में पहुँच गए सब जोर जोर ग्वालिन टेरत रे 

सांठ गाँठ सखियन में है रहि पकरों आज नन्द को छोरो 
लाल गुलाल गालन पै मलहों  करिहों  कारे तै  गोरो 
कान्हा चीनत सगरी चतुराई, कोई नाहि बच है अज कोरो 
दधि मट किन् में रंग भरावत साथ में कीचर घोरो 

ग्वालवाल समुझाय दये हैं लपक झपक सब घेरत रे    
होली खेलत रे नंद लाल जमुन तट होली खेलत रे 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Thursday, 21 March 2013


समय की शिला पर 

समय की शिला पर हैं कुछ चित्र अंकित ,   
   आज के युग में जो भ्रान्ति फैला रहे हैं 
        औचित्य जिनका न कुछ शेष दिखता 
            चलना गतानुगति ही सिखला रहे हैं  

साधन नहीं थे कोई आधुनिक जब, 
    रीते ज़हन को जो करते सुचालित  
      चित्र अंकित किये कल्पना में जो सूझे  
         कोई था न अंकुश जो करता नियंत्रित 

दायित्व है अब, नए चिंतकों का 
     आगे आयें, समीक्षा करें मूल्यवादी 
          तत्व जो बीज बोते, असमानता का 
                मिटायें उन्हें  हैं जो जातिवादी 

हैं कुछ मूल्य, जो मापते अस्मिता को 
     व्यक्ति के वर्ण और देह के रंग से   
          लिंग भेद को ,कुछ न भूले अभी भी 
             कलुष ही बिछाया विकृत सोच संग से   
  
समय आगया है हटायें ये पन्ने 
    लिखें वो भाषा जो सब को समेटे 
        विकासोन्मुखी हों, नीतियाँ हमारी 
           समय की शिला पर पड़े धब्बे मेंटे   
              
 श्रीप्रकाश शुक्ल 


बोल हैं कि वेद की ऋचाएं हैं 

तुलसी के मानस में झाँक कर देखा आज, 
   पत्नी वियोग में भगवान राम रोते हुए  
        पूछते लताओं से सीते को देखा क्या, 
           तुमसे कुछ कह सकी धैर्य को संजोते हुए  

 सागर की  महिमा को राघव ने मान दिया 
   सरिता तट जाकर सरयू को प्रणाम किया 
      गोबर्धन पूजा करते, सूर्य को चढ़ाते अर्घ्य 
         भारत ने सदा ही प्रकृति मय जीवन जिया 

प्रकृति को मानते हैं पुरुष की जननी सभी 
   भारत में मानते है माँ सामान पूज्या 
     पोषण भरण जो करती रही स्वार्थ रहित 
       जन जन के ह्रदय में रही बन के आराध्या 
              
प्रकृति के उपकार सकल स्वीकारते हैं, 
 पच्छिमी  भी,संज्ञा दे,  कहते हैं कार्बन ऋण 
      रचते उपक्रम अनेक, जैसे भी होसके 
          प्रकृति के औदार्य से हो सकें सब उऋण  

भारत के चिंतकों की बात ही अनूठी सी 
  लोक गीत, ग्रन्थों भरी जो अभिव्यंजनायें हैं   
     कितना ही प्रयास करो समझ नहीं पाओगे 
          अनुभूतियों के बोल हैं कि वेद की ऋचाएं हैं 

श्रीप्रकाश शुक्ल 


Tuesday, 12 February 2013

तेरी वीणा की झंकारें 

कब से नहीं सुनी  माँ , तेरी  वीणा की झनकारें 
भक्ति भाव से पूरित दृग माँ,इकटक तुझे निहारें

बचपन में निशदिन ही  तू माँ, साथ हमारे रहती थी
सा माँ पातु  सरस्वति ,जिभ्या रोज सकारे कहती थी
अध्ययन के पहले पहले, गुणगान  तुम्हारा करते थे
सद विचार, शुभ संस्कार  नित चित वृति में भरते थे

कितनी करुणा रहित हुयी माँ, सुनती नहीं पुकारें
मन  व्याकुल  सुनने  को  तेरी वीणा की झनकारें

हम बच्चे हैं अज्ञानी हैं , भिक्षुक ममतामयी  दृष्टि के
युगों युगों  से हम आकांक्षी विद्या ज्ञान कला वृष्टि के  
शिशु बालक अरु प्रौढ़ तरुण हम सब ही तेरे उपासक हैं
तेरी वीणा के मधुरिम स्वर अज्ञान तिमिर के नाशक हैं

माँ  तेरे पद रज के कण, अनगिन शठ, मूढ़ उबारें
हैं  मृदु  शान्ति प्रदायिनि, तेरी  वीणा की झनकारें


श्रीप्रकाश शुक्ल 
तुमसे कितना प्यार मुझे है 

उन्मत्त मधुप झुंझला कर बोला कलिके,तू कितनी निर्मोही
मैं घूम घूम कर  हुआ क्लांत, 
तू पलकें  ढांप चैन  से सोयी
किस तरह  बताऊँ तुझको पगली,तुमसे कितना प्यार मुझे है
सारे दिन मैं  रस निमग्न  था पर  ना मन की  प्यास बुझे है

मृदुहास अधर धर कलिका ने यों  कहा मधुप से ओ  दीवाने
स्पर्श जनित सुख, दुःख के कारण ये तो सारी दुनियां  जाने
मैं समझ रही हूँ समय माघ का रतिवर का सबसे प्रिय पल है
काम वासना से उर्जस्वित  थल जल चर, हर कोई विकल है

 आक्रोश प्रेम अभिव्यक्ति का अत्यंत सरल बचकाना ढंग है
 मेरे  जीवन का औचित्य, मात्र  तेरा  ही  प्यार, तेरा संग है 

 अरमान नहीं आ कर के घेरे, मुझे कोई   मधुपों की  टोली 
 मेरा तू सर्वस्व, तेरी चाहत जीवन, साँसे  मेरी तेरी बोली  

 केवल आभास तेरे होने का , मेरे जीवन का सार रहा  
तेरी उच्छ्वासों को छू कर , मौसम का सारा भार सहा 
मैं पीती रहती हूँ जो गा कर, तू इस उपवन में भरता है 
फिर भी कितना प्यार तुझे है, सुनने को दिल करता है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

मैं प्रतीक्षा कर रहीं हूँ 

बातें हुयी थी ढेर सारी,
समय असमय फोन पर 
विषय भी बदले अनकों 
बुक बदल पन्ने पलटकर 
हर बार ही तुमको,
मेरी आवाज में माधुर्य सूझा 
थे नहीं थकते कभी, 
कहते न ऐसा सुना  दूजा 

चित्र भी मेरा सभी
परिबार के मन भा रहा था 
सम्बन्ध बिलकुल ठीक है 
हर कोई बतला रहा था 
फिर पत्र इक पहुंचा 
कि जिसमें जिक्र था 
कुछ जरा सा  ही ,
रिंग तो हीरे की होगी,
कार होगी आधुनिकतम 
रंग हल्का हरा सा  । 
पायी खबर दो माह
पहले विवाह तिथि के, 
कैश भी तो  है जरूरी, 
क्या  करें सम्मान 
रखना  बन गयी है 
हमारी ,एक मजबूरी 
जब से पिता श्री ने सादर, 
असमर्थता बताई  है 
मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ 
न कोई रिंग, न कोई 
SMS ही आयी है  

श्रीप्रकाश शुक्ल 

 मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ
  यादेँ मधुर बीते दिनों की, आज करतीं हैं विकल
   मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ काश आयें लौट वो पल

  पल वो जब हमने सुनी थी, प्रीति से अभिषिक्त लोरी
    आँचल 
हिंडोला सा रहा , बांधे  रही मृदुहास डोरी  
  और ममतामय नियति, देती रही सुख की थपकियाँ
   प्यार दुलराता रहा, पर था कठिन लेना झपकियाँ

   संघर्ष रत थी  साधना,  थी 
जिंदगी सीधी सरल  
   मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ, काश आयें लौट वो पल 

   फिर अचानक एक दिन,  समय की जलधार छूटी  
    पल वो सुखमय बह गए, आशा समूची साथ टूटी 
     स्वप्न बन कर साथ अब रहतीं हैं सौगातें सभी 
    संभव नहीं  गुज़रे हुए  क्षण लौट कर आयें कभी 

    आस है गूंजे  गगन और मेघ बरसायें  सुफल
    मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ काश आयें लौट वो पल  


 श्रीप्रकाश शुक्ल