Tuesday, 6 November 2012


कब रह पाया दुःख अनगाया 

पुष्प पंखुरियों  सी म्रदु घड़ियाँ, समय धार में बह जातीं हैं 
शेष न कुछ रहता जीवन में,  केवल सुधियाँ रह जातीं हैं 
सुख-दुःख, अश्रु, हास, आलिंगन, इन सुधियों में रहा समाया 
जब अनुभूति विकल हो रोई, मचला दर्द,  कंठ तक आया 
                                 कब रह पाया दुःख अनगाया 

समबन्ध , प्रकृति, मानव मन का, रहा चिरंतन, गूढ़, सनातन 
समझ सका संकेत न मानव, देती रही प्रकृति जो  निशिदिन 
ऋतु बदली, मानव मन तडफा, विस्मृति सन्देश  उभर आया 
भुला सका न जिसे  कभी मन, शब्दों में बाँध गीत में  लाया  
                                 कब रह पाया दुःख अनगाया 

साँसों में सिमटी पीड़ा,  बरबस आँखों में भर आती है 
सिसकन उमड़ नहीं पातीं,  सहसा गीतों में ढल जाती है 
कितना भी धीरज, संयम हो, ये प्रवाह, मन रोक न पाया 
रह पायी ना मौन भावना,  दर्द ह्रदय का जब गहराया 
                               कब रह पाया दुःख अनगाया 
 
श्रीप्रकाश  शुक्ल 
मुझसे जितना दूर हुए तुम 

मुझसे जितना दूर हुए तुम, उतने  धड़कन के पास आगये 
समय पखेरू जितने  दूर गए,सांसों में उतना तुम समा गए 
नहीं भूल पाया अब तक मैं, मुरझाई सी वो चितवन,
पलकों में जब अश्रु भरे थे, करुणा भरा थका था तन मन,
पुरबा के झोंकों से जब भी, दिखा कोई उड़ता आँचल 
लगा यही तुम लौट दुबारा पास हमारे आ गए
अरी सुमधुरा, हम दोनों की दूरी भी क्या दूरी है  
लेकिन हाँ, तन की नहीं मगर मन की मजबूरी है 
प्रणय चाहता नहीं मिलन, बसा रहे बस चित्र  ह्रदय में
प्राणों की इस अमरबेल को,, केवल इतना ही जरूरी है 
धीरे धीरे बिरह आग में ,सुख स्वप्न सभी जल जाएंगे 
ध्रुव निश्चित है बीते दिन, अब लौट नहीं आ पायेंगे  
किन्तु परिस्थितियों ने जो, असमय तोडा सूत्र मिलन का 
गीत व्यथा के मेरे ये, संभवतः उसे जोड़ लायेंगे 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Tuesday, 4 September 2012


स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में

स्वर्ण श्रंखला के बंधन में, जकड़े मात्र प्रलोभन सब को 
जैसे कूकर, घट के मुंह में, ग्रीवा डाल, ना छोड़े गुड को 
मोह,सुरक्षा,सुख साधन का,दिन प्रतिदिन गहराता जाता 
अनुचित उचित बिना सोचे,हर एक परिग्रह में जुट जाता

इतिहास साक्षी है ये बंधन, रचता रहा अनेकों कृतियाँ  
इसकी उर्बरा शक्ति से उपजीं,अहंकार, मद, दर्प प्रवृत्तियां
इन आसुरी प्रवृत्तियों ने की, बुद्धी भ्रमित, आस्था नश्वर
बंधक लगा समझने खुद को जगत रचियता से भी बढ़कर

अतिशय धन पाकर जीवन का,सच्चा सुख जाता है छिन
मदहोसी दे, वो दर्द मिटाता, भरता जो खाली जीवन
स्वेच्छा से बंधना चाहो, तो बंधो प्यार के बंधन में
ओरों को दे प्यार, सही उद्देश्य भरो अपने जीवन में 

प्यार एक स्थिति है जिसमें, औरों का सुख, खुद का सुख है
जीवन आनंदातिरेक करता, वाकी तृष्णा दुःख ही दुःख है
निर्भरता, वैभव सुख साधन पर, सदा रही दुःख दायी है
स्वर्ण श्रंखला के बंधन में बंध, किसे शांति मिल पायी है
श्रीप्रकाश शुक्ल
Mahipal Singh Tomar
आ.श्री श्री जी , यह वाक्यांश-पूर्ति ,तमाम प्रेरक तत्वों को समाहित किये हुए बड...
Aug 30 (6 days ago)

बिखरी सी मुस्कान

आलस्य भरे वो नयन, स्वप्न मुकुलित हो खुलते, मुंदते
अधखुले अधर, इक बिखरी सी मुस्कान बिछा अनुपम सजते 
कौन सो रहा शयन कक्ष में,  घुटने चिबुक लगाये  
स्वर्ग लोक की सारी निधि, न्योछावर जिस पर हो जाये 

अभी अभी किलकारी भरता, रहा दौड़ता सारे घर में 
सीडीं चढ़ना , तुरत उतरना, खेल सर्व प्रिय था उर में 
लपक दौड़ जाता बगिया में, झिल मिल करते खद्योत पकड़ता 
बिखरी सी मुस्कान उभरती, जब भी हाथों एक ना पड़ता 

बाल सुलभ करतूतों  ने , जीवन में  दिशा  नई भर दी 
आया लौट स्वयं  का वचपन, बढती बय  छोटी कर दी
अनुकम्पा  अगाध उस प्रभु की है , भेजा ऐसा सुघड़ खिलौना 
जीवन के संताप हर लिए , आनंदित  दिल का हर कोना 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

ऐसा गीत सुनाया कर

सुख ना रहेगा सदा साथ में, व्यर्थ ना तू भरमाया कर,
जीवन में सुख भी है दुःख भी, दोनों गले लगाया कर  I

गीत प्यार के सदा सुहाने, लिख लिख कर तू रखता जा,
पर जो गीत आँख छलका दे ,ऐसा गीत सुनाया कर

आ धेरें विपदा के बादल, भरे निराशा अरमानों में गर,
नहीं टूटना, ना घबराना, पैर जमा डट जाया कर  I

मानव जीवन बेशक़ीमती, व्यर्थ ना इसको जाया कर,
जब भी घिरे अँधेरा बाहर, अंतस ज्योति जगाया कर  I

यह दुनिया संघर्ष भूमि है,पग पग पर अवरोध अनेकों,
निराकरण के लिए सतत तू, कर्म योग अपनाया कर I

श्रीप्रकाश शुक्ल 
छवि का पनघट आज बना 
नहीं निमंत्रण कोई आया ,नहीं  बुलाबा, ना आवाहन 
उमड़ पड़े  श्रद्धालु  विपुल , भोले  का करने आराधन  
वस्त्र गेरुआ, काँधे  कांबड़, बंधा कमर पटके का छोर  
हर हर बोले  बढा जा रहा  भक्तों का गुट सुरसरि ओर 

छवि का पनघट आज बना सैलाब  एक गंगा तट पर 
प्रेम भाव से  भक्त चढ़ाते  बेलपत्र जल वृषभकेतु पर 
था सावन का पुण्य मास, संपन्न हुआ जब सागर मंथन 
आशुतोष पी गए घटाघट, बिष से भरा कलश, हर्षित मन 

रुंध गया कंठ में भरा हलाहल दग्ध कर रही प्रवल ज्वाल 
जिसे  शमन करने को अब भी जलाभिषेक करते हर साल 
देवादिदेव  शिव  महादेव  भोले  भंडारी  बे  मिसाल  
जो पूजन करते श्रावण में, पाते अभीष्ट फल हो निहाल   

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Thursday, 5 July 2012


कसौटी पर कँचन की लीक है 

नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन और प्रलोभन धन अर्जन का, 
जन मानस के मनस पटल पर दीमक जैसा पौढ़ रहा है 
छोटे-बड़े, पुरुष- महिला, शासक - प्रजा, सभी की रग  में, 
भृष्ट आचरण का विषाक्त बिष अविरल गति से दौड़ रहा है 

विधि विधान के कड़े नियम भी, रोक सके ना ये प्रवृत्ति,
जो शनै शनै बढ़ते बढ़ते, जीवन शैली का अंग होगयी 
सत्य अहिंसा के खम्भों  पर आधारित  भारत की छवि 
बिगड़ी हुयी सोच के कारण सारे जग में व्यर्थ खो गयी 

तिमिर कसौटी पर कंचन की  एक चमकती  लीक सरीखा ,
उत्प्रेरक  जन आन्दोलन ही  वांछित परिवर्तन लाएगा 
होगा अपत्रस्त  दुराचारी,  दुस्साहस  होगा  चूर चूर , 
भरा हुआ पापों का घट भी  निश्चय फूट बिखर जाएगा  

श्रीप्रकाश  शुक्ल