Friday, 15 June 2012

गुलमुहर  ने बाँह में भर 
गुलमुहर ने बाँह में भर, हँस,पथिक को यूं पुकारा  
 बैठो यहाँ विश्राम करलो, भूल जाओ क्षोभ सारा   
   झुलसा रहा है गर्म मौसम,लू तपिश भीषण घनी हैं  
       और बढती प्यास  से, इन्सान की साँसें तनी हैं 
क्यों व्यथित. सोचो तनिक और मन की गाँठ खोलो  
सुन रहा हूँ मैं, झिझक बिन, आज अपनी बात  बोलो   

यह  महल अट्टालिकाएं सामने  हंसतीं खडी जो  
  तेरे श्रम की  ही बदौलत  आज हैं  खुशहाल वो  
    क्या हुआ जो आज तेरे पास कोई घर नहीं  है 
      चैन से सोता तो है दिल  में कोई भी  डर नहीं है 
दूसरों  की  डगर में खुशियाँ हजारों जो  भरें  
भाग्यशाली कौन उन सा काम जो परहित करें  
देख तू मुझको, तपन से सारे पत्ते झर गए  
  पर रंग लाया स्वेद बहना फूल आँचल भर गए 
   भेजती है प्रकृति भी मुझको सदा ऐसे समय  जब 
     हैं दहकती आग से तपते  झुलसते जीव सब  
तुझको यहाँ भेजा गया, ऐसी नियति देकर धरा पर
संबल बनो असहाय का, हो परस्थिति जब भी दूभर  

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Tuesday, 5 June 2012

मुक्तिका 054
मैं  हूँ गायक अपने ढंग का, राग अनछुए गाता हूँ  
नैराश्य ओढ़ जो सोये हैं, उनको झकझोर जगाता हूँ 
 
निश्चय होगी धूप डगर में, झुलसेगा तन मन सारा 
जो ख़ुशी ख़ुशी तैयार, झेलने, साथ उन्हें ही ले जाता हूँ  
 
राहें कभी नहीं बदलेंगी, युग युग से जो चली गयीं
अपनी राह बदल  लो खुद से, मूल मंत्र  ये  बतलाता हूँ 
मन  में जो संदेह उग बढे, ले बैठे आकार ताड़ का , 
अपने  भी घर में अब  कोई,  मीत नहीं मैं  पाता हूँ 

महज़ ऊँचाई पा लेने से, मन को शांति नहीं मिलती,
शांति चाहिए? प्यार बाँट दो, यही रोज समझाता हूँ 

सादर 
श्रीप्रकाश शुक्ल 
जिन्दगी के ओ बटोही यह नहीं विश्रांत का पल 

ओ बटोही, आप चल आये डगर इक़ बहुत लम्बी,

   और पथ में कीर्ति के स्तम्भ भी  अगणित गढ़े हैं 
      पर अभी भी है विकल, मख भूमि विश्वामित्र की,
          शांति जिसकी भंग करने, खल सुबाहु से खड़े हैं  

आज भी है आत्म गौरव, क्षीण, जर्जर, त्रस्त, दुर्बल
जिन्दगी के ओ बटोही, यह नहीं विश्रांत का पल 

शोषण, दमन का सांप, जो डसता रहा है युग युगों से
    आज भी वो मुंह छुपाये, भेष बदले जी रहा है 
       आज  भी पीड़ित उरों में, पल रही जड़ता, निराशा,
          ज भी दुखिया, तृषित चुपचाप आंसूं पी रहा है 
आज गुंजित हो रहा ,जन चेतना का स्वर प्रबल 
जिन्दगी के ओ बटोही, यह नहीं विश्रांत का पल
जाग्रत हुआ है आज जनपद और उमड़ा जोश जन  का
   आज सड़कों पर खडे कटि बद्ध हैं, अनगिन  कदम   
      ठोकने को कील अंतिम, छद्म चालों के कफ़न पर,
         जन समर्थन साथ ले, लड़ना पड़ेगा अथक  हरदम      
जागो, उठो भवितव्य का, निस्सार हो न कोई कल
जिन्दगी में ओ बटोही ,यह नहीं विश्रांति का पल

श्रीप्रकाश  शुक्ल 

Tuesday, 22 May 2012

मुक्तिका 001


डूबता जब भी सितारा 


गर्दिशें आ घेर लेतीं डूबता जब भी सितारा 
डूबती मझधार नौका रूठ जाता हर किनारा 

जिन्दगी इक़ मंच है और  कठपुतली सभी ,
चाहता जैसे नचाता, जगत का वो सृजनहारा  

आंधियां तूफ़ान आते, बाहुबल को तौलने,
विश्वास ले जो डट गया उससे चला कोई ना चारा 

धर्म ओंर रंग भेद के फुफकारते विषधर विषैले ,
वो बना अहिजित मुरारी जिसने कुचल इनको नकारा

था निहायत ही असंभव खाईयों को लांघ जाना 
पर खुदाया की महर से चिर गया तम तोम सारा 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

-

Sunday, 20 May 2012

मुक्तिका 002
 
बुझा हुआ दिल नहीं संभलता मुझे पता है
गढ़ी फांस का दर्द  ना टलता मुझे पता है

दान दक्षिणा देते हैं कितने ही पर ,
बच्चा अनाथ कैसे पलता मुझे पता है

झांसा देकर लूट रहे भोले भालों को,
दर्द भूख का कैसे खलता मुझे पता है

झूठ  गवाही देते हैं वो जाकर रोज़ कचहरी में
लेना देना कैसे चलता मुझे पता है

तपना बहुत जरूरी है खुद को खरा बनाने को
सोना गहनों में कैसे ढलता मुझे पता है 


श्रीप्रकाश शुक्ल
मुक्तिका ००३

 ये जो सच है  क्या वो सच है ?आज  चर्चा चल रही है 
 क्यों ना बोलूँ साफ़ मैं,  ख़ामोशी खुद की खल  रही है 

शहर के या गाँव के हों, पीटते सब लोग सर,  
स्वार्थपरता की  सियासत हर किसी को छल रही है 

पेट खाली ही रहा मेहनत मशक्कत बाद भी, 
जाल डालें,फितरती जो, दाल उनकी गल रही हैं 

संच है क्या और  झूठ क्या है, क्या ज़रुरत जानने की,
ख्वाहिश-ए-शोहरत बुलंदी, भूख  बनकर जल  रही  है 

ध्रुव सत्य है केवल यही, आया यहाँ जो, जाएगा,
किसलिए अमरत्व की फिर लालशा दिल पल रही है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
अनछुई सांझ को अचानक 


अनगिन सांझें बीत  गयीं, दुःख दर्द भरे पल जीते जीते  
  बिछड़े प्रिय की सुधि ना मिली, बीत गये दिन दृग जल पीते 
      अनछुई सांझ को आज  अचानक, उनकी इक़ पाती आई
            बुझे हुए तन  मन  में सहसा जाग उठी फिर से  तरुणाई 

थी मौसम की प्रथम बृष्टि सी, प्रीति भरी वो पाती 
      सरस  हुआ  रूखा उर आँगन,  शितलाई  तपती छाती  
           नैराश्य भरे जीवन के पल में, लगा, लौट प्रत्याशा आई 
               जैसे झुलस रही धरती को, चूमें घटा,  बहे पुरवाई 

अनमोल अक्षरों में सिमटी थी, केवल नयनों की भाषा 
   झलक रही वो पीड़ा जिसमें,  नश्वर  रही  मिलन की आशा 
      अभिशापित पलकों में छलके, प्रेम अश्रु रुक गए किनारे 
         मछली सा मन तड़प उठा, कर याद रस-अयन नयन दुलारे 

वो सांझ अनछुई घड़ियों की, अब  रह रह कर सुधि में आती 
   तन छूकर कैसे रही अनछुई, ये गुत्थी सुलझ नहीं पाती 
      स्नेह  सिक्त अभिव्यक्ति भरे, पाती, मन की प्यास बढाती 
              सूखा रहे तृषित मन प्रतिपल, जैसे घृत बिन दीपक  बाती  

श्रीप्रकाश शुक्ल 
.