Sunday, 13 October 2013

फिर भी मैं सुन लेता हूँ 

भारी भरकम भीड़ मगर, फिर भी आवाजें सुन लेता हूँ     
किसमें शोर शराबा, किसमें है संगीत मधुर, चुन लेता हूँ    

छल छद्म द्वेष से भरे पडोसी, बात मित्रता की करते हैं    
मुझे पता है, सब धोखा है, पर फिर भी मैं सुन लेता हूँ   

झेल न पाते खींचा तानी, रिश्तों के कच्चे धागे जब ,  
चढ़ा प्रेम का पक्का पानी, दस्तरदां बुन लेता हूँ  

मिथ्या आरोपों को सुनकर, भी होंठ सिये बैठे हैं जो  
अवसाद भरा कितना उनमें, मैं दिल टटोल गुन लेता हूँ

मनुसाई से बढ़कर कुछ भी भाव न होता जग में  "श्री "  
फिर भी न रेंगता जूँ कानों पर, सोच रोज़ सर धुन लेता हूँ  

श्रीप्रकाश शुक्ल  
फिर भी मैं  सुन लेता हूँ 

चलती फिरती छाया सी घर में   
हर समय लिए कुछ ना कुछ कर में  
उठ तडके प्रातः नित , मध्य रात्रि तक  
काम काज से नख चोटी तक थक    
बिस्तर पर आकर  गिर जाती है 
कैसी हो ? बता नहीं पाती  है 
मैं स्वेद बिंदु गिन लेता हूँ   
क्या बीत रहा है गुन लेता हूँ  
     फिर भी मैं सुन लेता हूँ 

कोई कैसा भी काम बिगड़ता  
आ दोष सदा उसके सर मढ़ता  
घर भी देखे,  देखे दफ्तर भी 
लगती विविधि प्रयोजन प्लग सी 
कहने को तो है गृह की लक्ष्मी 
सारी निधि लुटा रहे सहमी सी 
हो व्यथित सिर्फ सर धुन लेता हूँ 
छलके मोती कण चुन लेता हूँ 
    फिर भी मैं सुन लेता हूँ 

वो है मेरे  सांसों की  सरगम 
वो है मेरे घावों की मरहम  
मेरे उपवन का हरसिंगार 
मेरे सुखमय जीवन की बहार 
उसके पोरों की मात्र छुअन 
हर लेती मन की सभी तपन 
साथ उसे पा, स्वप्न नए बुन लेता हूँ 
    फिर भी मैं सुन लेता हूँ 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
अपना झूठ सही करने को  देते हैं वे तर्क हज़ारों 

जीवन की स्वाभाविक प्रवृत्ति, हम संस्कार से पाते हैं 
मूल रूप जिसका थिर रहता, कभी बदल ना पाते हैं 

बेल करेले की चन्दन पर, चढ़ी रहे कितने  भी दिन 
थोड़ी सुबास तो आ सकती है, कटुता नहीं मिटा पाते हैं

हर समाज में कतिपय जन, स्वेच्छा से चुन कई मुखौटे, 
छद्म वेश में रहने की ही, जीवन पद्धति अपनाते हैं 

बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता से, अपने भविष्य की दशा आंक,  
यदि आगे काम निकलता हो, तो गधे को बाप बनाते हैं 

अपना झूठ सही करने को,  देते हैं वे तर्क हज़ारों 
अपने पांडित्य प्रदर्शन को, हर विषय में टांग अड़ाते  हैं 

कोई भी, बालक, महिला या हो जान छिड़कने वाला,
कुछ भी अंतर नहीं व्यर्थ ही, सभी दुलत्ती खाते हैं   
 
स्वार्थपरक ऐसे मानव, दूर शिष्टता से कोसों "श्री "
हर टोली, हर समाज में, भार रूप समझे जाते हैं 


श्रीप्रकाश शुक्ल 
अपना झूठ सही करने को देते  है वे तर्क हजारों 

हर समाज इक उपवन है, रोपते जहाँ जन पुष्प हजारों 
पर अनचाहे ही उग आते हैं, ज़हरीले से खार हजारों 

कुछ अभितप्त अहम् के बस, फंदा फरेब का हाथ लिये 
अपना झूठ सही करने को, देते रहते है तर्क हजारों 

नहीं जानते काठ की हांड़ी, चढ़ती है बस एक बार ही 
पश्चात, कलई खुल जाने पर मुंह की खाते बार हजारों 

चालाकी चाटुकारिता की, ओढ़े अमरबेल सर ऊपर 
अपना उल्लू सीधा करने, छुप छुप करते बार हजारों 

कैसी विडम्बना है ये, कि पढ़े लिखे शिक्षित जन भी 
स्वच्छ नीर को गर्हित करने, मिल जाते हैं साथ हजारों 

दोष कहाँ है, शिक्षा का या संस्कार का, कैसे जाने "श्री"
कदम कदम पर भरे पड़े हैं, इस जमात के लोग हजारों 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

चीनी घुसपैठ


चीनी घुस आये सीमा में, शासन  पर प्रतिबन्ध अनेकों 
अब यह दायित्व फौज का है, सबक सिखा  बाहर फेंको   
केवल शब्दों की  दस्तक से, शर्मदार ही भय खाते हैं 
जो चोला ओढ़े बेशरमी का, फन उनके कुचले जाते हैं  

पर ये कैसे हुआ, कहाँ थे, निर्धारित  सीमा  प्रहरी 
क्या दारू पीकर सोये थे, कर बैठे गफलत गहरी 
या दुश्मन ने एक बार फिर, वही पुरानी  चाल चली
भेज मेनकाएँ सीमा पर, सीमा  रक्षक की बुद्धि छली 

इतिहास साक्षी है इनकी निशदिन घुसपैठी चालों का 
बाहर खदेड़ दो घुस आयें फिर, सर घूमे  रखवालों का 
लातों के भूत ना माने बातों से, हम  नस पहचानते हैं  
सेना सक्षम है हर प्रकार, कैसे निपटें,  वो  जानते हैं  

फौजे विश्वास नहीं करतीं, छुप छुप फेंके हथकंडों में 
करतीं प्रहार बस एक बार कम्पन उठता भू खण्डों में 
अच्छा होगा यही कि दुश्मन करे आंकलन शक्ति का 
शिष्टता न आंके फौजों की पर्याय नहीं अभिव्यक्ति का 

श्रीप्रकाश शुक्ल  

Wednesday, 14 August 2013

बहता है उसे बहने दो 
 
उद्विग्नमना दुखप्लावित हृद से, 
स्पर्श सांत्वना का पाकर, 
दुःख का निर्झर फूट पड़े तो, 
उचित यही है, बांधों मत, 
बहता है उसे बहने दो 

जीवन के दुर्गम पथ में, 
आशाओं और निराशाओं के, 
सूरज भी हैं, बादल भी हैं  
समझ नियति की चाल,अगर  
मन सह सकता है, सहने दो 

जग में होता अनियाउ देखकर ,
जन में बढ़ता दुर्भाव देखकर,
उद्द्वेलित होता है यदि मन, 
प्रतिबंधित कर, टोको मत, 
बात पते की कहता है, कहने दो  

जग में झंझावात प्रबल हैं  
पर संभव सब के ही हल हैं 
शांत भाव, मर्यादित ढंग से 
बिनिमय विचार का होने दो 
मन में द्वेष न पलने दो 
अपने ही राग बिगाड़ रहे 
खिलता चमन उजाड़ रहे 
ज़िम्मे से पल्ला झाड़ रहे 
जो बोलूँ, बात अखरती है 
मैं चुप हूँ,चुप ही रहने दो 

विपदा के बादल आते हैं 
गर्जना घोर कर डरपाते हैं 
दामिनी भयावह लगती है 
पर कर्मवीर बन डटे रहो 
मन का विश्वास न ढलने दो 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Tuesday, 6 August 2013

छककर दुःख सुख के घूँटों को

जो  इंसान  बे सबब   ही,  औरों  को  कांटे  बोते हैं   
नींद  बिगडती औरों  की, खुद  का  चैन  भी  खोते हैं    

छककर दुःख सुख के घूँटों को, जो पीते हैं एक भाव  
निश्चय ही वो ख़ुशनसीब, जीवन अश्रांत हो ढ़ोते  हैं                  

जीवन फूलों की सेज नहीं, है गुलाब  का पौधा  वो  
खुशबु-ओ-हुस्न के साथ साथ, जिसमें कांटे भी होते हैं 

संसार जलधि,जीवन नौका,लहरें है दुःख सुख जैसीं  
सोच समझ कर खेते जो, खाते नहीं कभी गोते हैं  

दोस्त  भरोसेमंद  मिलें तो, समझो  मेहर  खुदा की है  
बरना  रोज़ाना  कितने,  किस्मत  फूटी  पे  रोते हैं  

खट्टे मीठे फल जीवन में, कर्मों की फसल उगाती है  
जो समझे ना  क्या बोना, जागते हुए भी सोते हैं  

परहित सेवा से लुत्फ़ मिले और साथ में पाप धुलें  
रहते मुगालते में वो, जो गंगा नहा पाप धोते हैं  

ऊँगली एक उठाते हो जब, तीन घूरती खुद को "श्री" 
हश्र न समझें इल्ज़ामों का, उनके मदरसे थोते हैं  

श्रीप्रकाश शुक्ल