Tuesday, 6 August 2013

धरती के खुले पत्र पर

मात्र चार सौ वर्ष पूर्व ही, 
हम सोने की चिड़िया थे
जड़ चेतन का साथ अनूठा, 
तारतम्य सब बढ़िया थे 

शिखर वादियाँ नदी सरोवर,
विस्तृत फैले बागान अनोखे 
मुठिया थामे गीत कृषक के 
शांति समृद्धि के रहे झरोखे 

अति आत्मीया धरणि हमारी, 
प्रेरणा स्रोत और जीवनदायी 
आँचल भरे संपदा अगणित,  
आधार शक्ति पावन सुखदायी 

इस धरती के खुले पत्र पर, 
हम अनजाने क्या लिख बैठे 
संकीर्ण सोच  के बसीभूत, 
प्राणदा प्रकृति से बरबस ऐंठे 

सुख की असीम चाहत में हम,
दोहन करते रहे प्रकृति का
कभी न सोचा फल क्या होगा,
विघटन और उत्खनन अति का 

आज प्रकृति रूठी है हम से, 
धूल धूसरित सज्जा साज़ 
क्षम्य नहीं क्षण भर की देरी 
चिंतन कर बदलें अंदाज़  

श्रीप्रकाश शुक्ल 
गंगे तुम को शत शत प्रणाम 

जटा छोड़ तुम भोलेश्वर की उतर धरा पर आई 
साठ सहस्त्र सगर पूतों की तुम थी जीवनदायी  
जीवन के अंतिम पल में तेरी एक बूँद मुंह पाकर 
पाते रहे स्वर्ग का आश्रय अनगिन पाप मिटाकर 
मन हर्षित होजाता है पाकर तेरे दर्शन अभिराम 
गंगे तुम को शत शत प्रणाम 

उद्गम से सागर तक तूने पथ ऐसा अपनाया 
आँचल बसे करोड़ों जन ने जीवन संबल पाया 
पर कृतघ्न हम ऐसे भारी भूल गये तेरा संमान 
फेंक कालिमा आँचल में करते रहे सदा अपमान   
माँ तेरा अपराधी हूँ मैं त्राहि माम् माँ त्राहि माम 
गंगे तुम को शत शत प्रणाम 

 श्रीप्रकाश शुक्ल 

Thursday, 11 July 2013

प्रेयसि  प्रकृति पलकों रहे

बादल फटा, धरती फटी, दर्द का दरिया बहा 
माँ की सूनी गोद रोई, फिर भी तू क्यों चुप रहा 

मानता हूँ भूल कुछ, हमसे भुलावे में हुयी
पर रोज़ हम मिलते रहे, तूने कभी न कुछ कहा 

तू जानता अच्छी तरह, दिल में हमारे तू बसा 
तेरी खातिर इस जहाँ में, मैंने क्या क्या ना सहा 

बात अब मेरी नहीं, मात्र तेरी शान की है  
रोकी न अब जो त्रासदी, सब लगायें कहकहा 

सीख ऐसे हादसे से, ले चुका है आज " श्री"
प्रेयसि पृकृति पलकों रहे,  ये मेरा बादा रहा 


श्रीप्रकाश शुक्ल 
फिर से धूप  धरा पर उतरी 

बिना मीत मन रीती गगरी  
तृषित रहे जीवन की डगरी 


बिन बोले सखि चले गए वो, 
कसक उठी, बेकदरी अखरी 

वर्षा गयी, शरद ऋतु आई, 
पिया मिलन की चाहत उभरी 

आँखें पथराई, बाट जोहते,
आँगन में मायूसी पसरी  

कटती नहीं सांझ और रातें,
युग युग सी  बीते दोपहरी 

हर-चन्द सब सुख साथ रहे, 
पिय की याद न पल भर बिसरी 

पिय आये जब मेरी नगरी ,
फिर से धूप  धरा पर उतरी 

धूप तपे, या बादल बरसे ,
पिय का साथ यक़ीनी छतरी 

बिना मीत क्या जीना है "श्री "  
बोझ लगे जिंदगानी सगरी 

श्रीप्रकाश शुक्ल 


फिर से धूप  धरा पर उतरी 

मन की चादर के धागे सब उलझ गए हैं मैं में बिंधकर   
   सुलझाने के  हर प्रयास पर  फिरता पानी  रह रह कर   
       कुछ उलझे लोलुपता बस, कुछ शोहरत की चाह भरे मन  
            जब तक ज़हर द्वेष का दिल में, ढाई अक्षर कैसे घोलूँ   
             फिर से  धूप  धरा पर उतरी, कैसे बोलूँ 

सारा जग संताप ग्रसित है, अविश्वास की अटल  दिवारें   
     चहुँ दिश गूँज रहे पीड़ित स्वर, ह्रदय भेद्तीं करुण पुकारें 
          कैसे बनूँ विकल बादल जो, कर ले वरण रूप शशिधर का  
             कैसे भार हरूं हर मन का, कैसे द्वार आस के खोलूँ  
             फिर से धूप  धरा पर उतरी ,कैसे बोलूँ 

लेकिन यह भी अटल सत्य है, उम्र तिमिर की भी सीमित है  
     बदलेंगे हालात देश के, जनगण शक्ति अपरिमित है  
          तम की निशा विदाई लेगी, अरुण रश्मियाँ फिर चमकेंगीँ  
               पत्थर सभी पलटने होंगे ,यह पल नहीं चैन से सो लूं  
                फिर से धूप  धरा पर उतरी, कैसे बोलूँ 


श्रीप्रकाश  शुक्ल 
तेरे आने का असर है शायद 

दादुरों  ने एक स्वर में, फिर से पंचम स्वर उचारा   
  चातकी ने टक टकी भर, आस ले, नभ को निहारा  
      तेरे आने का असर है शायद, कि मन  पूछता है  
         ओ साथिया क्यों जा रहा, छोड़ कर के ये नज़ारा  

वादियों में आज फिर से,  कोपलें मुस्का उठी हैं 
    भ्रमरियाँ मदहोश हो, मधुपान में  जी भर जुटीं हैं  
        तेरे आने का असर शायद, कि निधियां बादलों की 
          सर्वस्व अर्पण कामना से,  भूमि पर खुद ही लुटीं हैं  

तेरी बिदाई के समय, सबने कहा था अश्रु भर 
    लौट कर आना तुरत, होंगे प्रतीक्षित वर्ष भर
        पश्चिमी दक्षिण दिशा से आप आये धन्य हैं हम 
             आज सारे नृत्यमय हैं झील, सागर, सरि, सरोवर 


श्रीप्रकाश शुक्ल