Tuesday, 12 February 2013


खड़ा मोड़ पर आकर फिर  इक नया वर्ष है

खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है
ओ आगंतुक क्षमा करो, अगवान न मैं कर पाऊँगा

है ह्रदय क्षुब्द्ध आहत आतम,  चेतना हमारी क्षार क्षार है
चन्द दरिंदों का बहशीपन, मातृशक्ति पर खुला बार है
जिस माँ की पग धूल धार सिर, कूदे हम रण भूमि मध्य
उसे आज अपमानित करने, कैसे कोई दिखता सनद्ध

लज्जित है कण कण भू का, अपमान न ये सह पाऊँगा
ओ आगंतुक क्षमा करो अगवान न मैं कर पाऊँगा

केवल विकल्प है शेष एक, हर तरुण भीष्म संकल्प करे 
नारी न कभी अवमानित हो प्राणाहुति  देनी पड़े भले
हर नारी को भी ममता तज  रणचंडी रूप दिखाना होगा 

दुष्टों के संहार हेतु अब  युद्धभूमि में आना होगा 

कल्पनातीत घटनाओं को संभव नहीं भूल पाऊंगा 
ओ आगंतुक क्षमा करो अगवान न मैं कर पाऊँगा

श्रीप्रकाश शुक्ल 
खडा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है 

वर्ष एक पहले आये थे, इसी तरह मंगलमय क्षण बन 
नयी उमंगें नयी आस भर, हर्षित थे सब के अंतर्मन 
विश्वास तोड़ जनता का तुमने, पैरों तले कुचल डाला 
होंसला बढ़ाया चोरों का, घर घर दिखा दाल में काला 

शंकाओ से है पूरित मन, निष्प्राण पड़ा जीवन प्रकर्ष है
 बांह पसारे खडा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है 

 आशायें रक्खें क्या कल से, क्या हालात बदल पायेंगे
 कीड़े जो भरे दरिंदों के, क्या संभव कभी निकल पायेंगे
 क्षार क्षार सब मूल्य हुए हैं ,तार तार सपनों की चादर 
 मन उद्विग्न, भूल पथ बैठा मरुथल में जैसे यायावर 

 आगंतुक ! दु ख भरा ह्रदय ये, लेश मात्र भी नहीं हर्ष है 
 बांह पसारे खडा मोड़ पर, आकर फिर इक नया वर्ष है 

असमंजस में  डूब रहा मन  सोच रहा है क्या निदान है 
कसक रहे अनुताप ह्र्दय में  बाहर  झूठा सा गुमान है 
आज तूलिका कहती है, मत लिखो गीत सम्मोहन के 
लिखो आज ऊधल की गाथा,शौर्य कृत्य वीरोचित मन के 

आतंकी परिदृश्य भयावह, देता बस एक ही विमर्श हैं 
बढ़कर आगे संघर्ष करो , खड़ा द्वार पर नया वर्ष है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया बर्ष है

बाँह पसारे , खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया बर्ष है 
अपलक नयन युगल, पथ देखें,भरा दृष्टि अटपटा हर्ष है

आँखों के सन्मुख आ तिरते, जब परिदृश्य गए सालों के   
नैतिकता के अधम पतन के, निन्दनीय घोटालों के 
फसीं  दरिंदों के चंगुल में ,लडती  रहीं दामिनी  दम भर  
आश्वस्त करें कैसे  खुद को, तब आने वाले कल पर 

धुल धूसरित हैं सब सपने, थका  हुआ जीवनोत्कर्ष है  
बाँह पसारे , खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया बर्ष है

सही दिशा जीवन की है पर, आशावान सदा ही रहना 
गत भूलों में कर सुधार,सुखद कल्पना सरि में बहना  
जन समूह में शक्ति बहुत है, नव निदान मिल जायेंगे  
हत उत्साह पार्थ जो बैठे, कर्म भूमि में फिर  आयेंगे  

बाहों में बल, तेशा हाथों में, चट्टानी भू, हाँ  संघर्ष है 
आओ बढ़ आलिंगन कर लें, खड़ा मोड़ पर नया बर्ष है 

तेशा :  कुदाली, crow bar 
श्रीप्रकाश शुक्ल 

Thursday, 13 December 2012


इस मिटटी के यहसान चुकाना मुश्किल  है

भारत की इस मिटटी के, यहसान चुकाना मुश्किल है
कितना क्या पाया हमने, ये लिखपाना मुश्किल है    

कर्तव्य,धर्म,नैतिकता के संस्कार घुट्टी में पीकर 
शांति हेतु,जनता हित में, बेशुमार दूभर दुःख सहकर      
सिंहासन तज बने सारथी, बन बन भटके रूखा खाए 
वांछित अंकुश लोकपाल के, राजाओं ने स्वयं लगाए 

राज धर्म के इन मूल्यों को, सहज निभाना मुश्किल है 
भारत की इस मिटटी के, यहसान चुकाना मुश्किल है 

देश प्रेम और सदाचार की, नीति कोई भारत से सीखे 
भरे पड़े इसकी रजकण में, झाँसी रानी, शिवा सरीखे 
दुष्टों को दण्डित करने पर, सदाचार हरगिज़ न भूले 
न्यायोचित अधिकार दिए, इसके पहले कसाब झूले 

ऐसी, उर्वर बलिदानी मिटटी, और कहीं पाना मुश्किल है 
भारत की इस मिटटी के यहसान चुकाना मुश्किल है 

इस भूमिखंड ने अनगिन चिन्तक,वैज्ञानिक उपजाए हैं
यंत्रवेत्ता,डाक्टर,कार्मिक, सारे 
 जग पर छाये है 
इनके बलबूते मेहनत पर, सारा जग रोटी खाता है 
सच पूछो तो भारत की रज, जग की भाग्य विधाता है 
माल्यार्पण कर शब्दों की, स्तुति रच,गाना मुश्किल है 
भारत की इस मिटटी के, यहसान चुकाना मुश्किल है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 


धन्यवाद स्वीकार कीजिए 

कौन विश्वकर्मा जगती का, किसने नदी पहाड़ बनाये   
   किसने रचे चाँद और सूरज, किसने नभ तारे चमकाये  
      अस्थि मांस के पिंजर भीतर, किसने भरे भाव अलबेले 
         प्रकृति सखी को किसने बोला, पुरुष गोद में हरदम खेले 

इस भूतल पर मात्र प्रकृति ही, एक आवरण, ऐसी कृति है  
  जिसका सृजन हुआ मानव हित, हर अवयव सेवा अर्पित है 
    क्या है कोई शक्ति अलौकिक, जिसने रचना की मानव की 
        तदोपरांत की कुदरत रचना,जो सहचरी बनी जीवन की 

प्रकृति पुरुष की उद्गम गाथा, मानव बुद्धि चकित करती है 
   और प्रकृति की संचालन विधि, भक्ति भाव मन में भरती है  
       विज्ञानं,ज्ञान के अर्थ समूचे, समझ सके न भेद जगत का 
            पुरुष और मानव का अंतर, अंतर  ईश्वर, शाश्वत सत का 

ज्ञात नहीं वो कौन, कहाँ है, जिसने सारा चक्र चलाया 
    हारे थके मनीषी सारे, पर यथार्थ कुछ समझ न आया  
        अपनी प्रवृत्ति अपने स्वरुप का, कुछ तो भी आभास दीजिये  
            रोम रोम आभार पूर्ण प्रभु, धन्यवाद स्वीकार कीजिये 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Wednesday, 14 November 2012


दीप के पर्व पर जब जलें- दीप, ऐसे जलें 

दीप के पर्व पर जब जलें- दीप, ऐसे जलें 
कि हो अड़िग सकल्प,निष्ठा, कलुष तम से जूझ पायें
इरादे, कर गुजरने के कभी दिल में पलें, ऐसे पलें
कि हर साँस की उच्छवास से, अन्याय के दिल काँप जायें 

दीप के पर्व पर जब जलें -दीप, ऐसे जलें 
कि रश्मियाँ उनकी छिटक सारी धरा को जगमगायें  
प्रीति प्रादुर्भाव हो, मन में फलें सुविचार, ऐसे फलें  
शमन हों आक्रोश, लिप्सा, छिन्न हों कटु भावनायें  
दीप देता है संदेशा जल सको, तो यों जलो  
निज स्वार्थ, बाती बन जले, परमार्थ घृत बन, लौ बढायें 
और ढलना हो कभी फौलाद में, तो यों ढलो 
लाखों बबंडर सर पे टूटें, तो भी सपने बुझ न  पायें  

दीप पाता है प्रतिष्ठा कर्म से, न कि माप से 
क्यों न हम अनुकरण कर, अस्तित्व की बाजी लगायें 
और जो झुलसे, जले हैं, दीनता के ताप से 
आस की  दे इक किरण, अभिकाम जीने की जगायें  

  श्रीप्रकाश शुक्ल 


सियोना 

शरद पूर्णिमा की प्रातः को
                   छिटक चांदनी भू पर आई  
राहुल अमीशा के आँगन में 
                   धूप गुनगुनी  सी आ छाई  
साईशा  की नन्हीं बाहों में 
                   आ टपका इक सुघढ़ खिलौना 
अन्नू आयुष और माही ने 
                    पायी छुटकी बहिन सियोना 
नाना नानी का खुशियों से 
                   भरा आज दिल का हर कोना 
दादा दादी बाट जोहते 
                    जल्दी  ही मिलने जायेंगे 
जो कुछ अच्छा सीखा अब तक 
                     सभी भेंट कर आयेगें  
                      
दादा -दादी