Thursday, 14 July 2011

मान्यवर : आदरणीय अचल जी द्वारा दिए गए वाक्याँश को ठीक तरह से न समझ पाने की स्थिति में एक झोंक में जो रचना बनी थी, आप सबके साथ बाँट रहा हूँ





सहायक सन्दर्भ :


अजगर करे ना चाकरी ------------


राम भरोसे जो रहें -----------------





कल की क्यों करते परवाह

यह चिंतन का प्रश्न अनूठा, कल की क्यों करते परवाह
बिन सोचे कल क्या होगा , क्या संभव है जीवन निर्वाह
बांछित है सार्थक चिंतन, जो चाहो, कल हो खुशहाल
पर चिंता और व्यग्रता डसते, जैसे हों बिष भरे व्याल


है मनुष्य सामाजिक प्राणी , जग से रहे अछूता कैसे
जीवन दिशा बदलनी होगी, चलती दिखे बयार जैसे
बिन सोचे अंजाम अगत का, काम जो कर जाते हैं
खोकर दिव्य अस्मिता, सालिग्राम बन जाते हैं


सबसे भले हैं मूढ़, युक्ति जो , तुलसी गुनकर बोली
खो बैठी औचित्य, महज़ बनकर रह गयी ठठोली
दास मलूका की सलाह में ,कुछ भी खरा नहीं है
पर्वत की चोटी पर भी, कुछ भी हरा नहीं है

दूर दर्शिता ही जीवन में , सही मार्ग दिखलाती है
अग्र सक्रियता आगे चलकर, जीवन गम्य बनाती है
चिंता त्याग, सही चिन्तन ,पथ प्रशस्त निश्चय कर देगा
जीवन होगा सुखद शांत, अनगिन खुशियाँ भर देगा


श्रीप्रकाश शुक्ल
काल की क्यों करते परवाह


काल की क्यों करते परवाह, न जानें कल क्या होगा
सारा सार इसी पल में है, ये संभला तो सब हल होगा
काल हमारे नहीं साथ, ये केवल मन का भ्रम है
परिवर्तन तो अटल , प्रकृति का निश्चित क्रम है

भूत भविष्य दोनों ही हैं, केवल मन की कल्पना मात्र
वर्तमान ही सोच अकल्पित, सत्य निरंतर, एकमात्र
जब वर्तमान की चिंता ही, होगी चिंतन का आधार
जीवन विकसेगा विविध रूप सहज सुगम इच्छानुसार

ऐसा कोई नहीं जगत में, काल जाल में जो न फंसा
कालांतर में कुटिल काल के , कटु चंगुल में जो न कसा
लेकिन वही शीर्ष पर पहुंचा, जिसने साहस, धैर्य न छोड़ा
बुद्धिबल पूर्ण विकल्पों से प्रतिकूल हवाओं को मोड़ा


क्यों डरते झंझावातों से, क्यों आश्रित रेखाओं पर
क्यों होते हतप्रभ निराश , जीवन की दुर्गम राहों पर
अंतरतम खोजो, समझो, सारी शक्ति निहित अन्दर
सब अभीष्ट पा सकते हो, बिना काल की चिंता कर


श्रीप्रकाश शुक्ल

कथ्य सन्दर्भ : भट्टा परसौल उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर में एक छोटा सा गाँव है . यहाँ किसानों की भूमि शासन द्वारा सस्ते मूल्य में लेकर ठेकेदारों को दे दी गई , न्याय मांगने पर उन पर लाठियां बरसायी गयीं .


आग अपने राग में भर


परसौल भट्टा की कहानी, बंद आँखें खोलती है
कहर खुद ढाती सियासत, अमन में विष घोलती है
जो थे समर्थक सत्य के, सत्ता के हाथों बिक गये
गगनभेदी स्वरों के भी, मुंह में ताले लग गये


पास में बस एक था, भूमि का निष्प्राण टुकड़ा
जिसमें गलाकर अस्थि-मज्जा, अन्न के दाने उगाते
और कोई भी नहीं, उपलब्ध था साधन सुलभ,
भूख जिस से शांत कर , निर्वसित तन ढांक पाते


कौड़ियों के मोल जब, छीनी गयी ये जीविका
और दुहाई न्याय की, लाठियां खाती रही
जूं न रेंगा कान पर, द्रौपदी की चीख सुन
पट्टी संभाले आँख की, सौबली गाती रही

सहसा उठा उद्गार मन में, इक नई हुंकार भर,
वेदना असहाय की, जो कह न पाए हो निडर
वो कापुरुष है, कवि नहीं, व्यर्थ माँ शारद का वर
धिक्कार उसकी चेतना, दाब से जो जाए डर

अब समय आया अपेक्षित, समय को पहचान ले
अवलेखनी बदलेगी दुनियां, ऐसा निश्चित मान ले
कवि धर्म का निर्वाह तब, अशआर छेड़ें नया स्वर
अन्याय धू धू जल उठे, तूं आग अपने राग में भर

श्रीप्रकाश शुक्ल

Sunday, 5 June 2011

संभ्रम


क्यों खड़ा तू आज विह्वल,
हो प्रकम्पित स्वयं से डर
क्यों नहीं मिलती दिशा,
दिखती न क्यों चाही डगर


कौन है अनुबंध वो,
लिप्त तू  जिसमें अकारण
कौन वो नश्वर प्रलोभन,
कर रखा जिसको वरण


क्यों न पाता भूल तू,
मानस जनित अभिप्रीति वो
स्थायित्व जिसका कुछ नहीं ,
मात्र मृगजल भ्रान्ति जो


क्यों समझ बैठा है तू,
हो रहा है जो घटित
वो है नियति की बाध्यता,
पूर्व निर्धारित रचित


क्यों न सुन पाता तू,
क्रंदन, ह्रदय में जो उठ रहा
ओढ़ तम का आवरण
हतबुद्धि ,क्यों तू घुट रहा


उठ स्वयं अनुमान ले,
वो शक्ति जो अन्तर्निहित
चाहे, बदल दे नियति भी
तू बुद्धिजीवी प्रकृति कृति
 
श्रीप्रकाश शुक्ल

Friday, 27 May 2011

भंग हुआ ज्यों सपना


झांसा देते रहे दोस्त को,
गढ़कर झूंठे नए कथानक I
भिक्षा में पाते जो टुकड़े ,
रचते उससे कृत्य भयानक II


आतंकी गतिविधियों से,
ढाया जग में नित्य कहर I
नीवं मित्रता की आधारित,
अविश्वास की रेती पर II


फिर जब समझे चतुर मित्र,
कैसे वो अब तक छले गए I
आ धमके डोली लेकर,
दूल्हा औ सामां ले चले गए II


सारा आवाम था हैरत में,
ठनकाता माथा अपना I
आँखें फटीं, फटीं, रह गयीं ,
भंग हुआ ज्यों सपना II

श्रीप्रकाश शुक्ल

चिरस्मरणीय मेरी माँ


गंगाजल सा पावन मन था
हिमगिरि सा व्यक्तित्व महान
शब्द नहीं जो कर पायें हम
अम्मा तेरा गौरव गान


तीर्थराज सा गरिमामय,
माँ था सानिध्य तुम्हारा
देव तुल्य वह "पूर्ण" रूप है
अब आराध्य हमारा


ओजभरी वाणी थी तेरी,
तेजमयी तन्वंगी काया
तेरी प्रतिभा और ज्ञान को
किस किसने न सराहा


अगर किसी ने कठिनाई में
द्वार तेरा खटकाया
खुली बांह से निर्मल मन से
उसे तुरत अपनाया


सोचा न कभी, है निजी कौन,
और है, कौन पराया
दुर्बल कन्धों पर भी तुमने
कितना बोझ उठाया


तेरे संरक्षण में पनपे
हम कितने बडभागी
पद चिन्हों पर चला करेंगे
हम तेरे अनुरागी


तेरी पावन स्मृति से होंगे
पंथ प्रशस्त हमारे
प्रेरक स्रोत हमारे होंगे
जीवन मूल्य तुम्हारे



श्रीप्रकाश शुक्ल
फूल ने सीखा महकना


फूल ने सीखा महकना , और बिखरायी सुरभि,
देता रहा आनंद नित , भूला न खिलना, खिलखिलाना
तारिकाएँ , बंध तिमिर भुज पांस में
आतना सह्तीं रहीं , पर न छोड़ा जगमगाना



अजानी राह जीवन की, कठिन , काटों भरी है
और गठरी फ़र्ज की, कमजोर कन्धों पर धरी है
मुश्किलों की आंधियां, आकर संजोया धैर्य हरतीं
टूटता विश्वास पल पल, मंजिलें गिरती, संवरतीं


पर तूं मानव बुद्धजीवी, अक्षम्य तेरा लडखडाना
पार कर अवरोध दुर्दिम, बस तुझे चलते ही जाना
टूट जाए तन, न टूटे मन, न छूटे मुस्कुराना
हर कृत्य फैलाए सुरभि, हर शब्द बन जाये तराना


याद तूं करले, उन्ही को याद करते है सभी,
निज स्वार्थ से उठकर, पराये काम करते जो कभी
सुन कहानी दर्द की, पीड़ा उमड़ कर बह निकलती
इंसानियत जिनके दिलों में, रोज उगती और पलती,


फूल ने सीखा महकना , और फैलायी सुरभि,
देता रहा आनंद नित,, भूला न खिलना, खिलखिलाना




श्रीप्रकाश शुक्ल