Friday, 29 April 2022

प्रथम प्रविष्टि गांऊं कैसा गीत गांऊं कैसा गीत जो उठकर नील गगन में लहराये मानस के अंतस में घुलकर सागर सी गहराई लाये छेड़े तन मन में उमंग, प्रतिवर्धित करे धैर्य सीमा जन्मभूमि के प्रति मानव में मां से बढ़कर प्रीति जगाये आराधना करूं मां शारद से दे दे मुझको ऐसी शब्दावलि जो स्वयं नियोजित,अवगुंठित हो आड़म्बर में आग लगाये जो खड़े पंक्ति के अन्त छोर, ओढ़े नैरास्य की चादर गांऊं ऐसा गीत जो उनको बरवस विकास धारा में लाये आज समय की मांग कि जब "श्री" आसुरी वृत्तियां आपे से बाहर मेरा गीत जहन में उनके सदबुद्धि की सोच उगाये । श्रीप्रकाश शुक्ल
पूनम की चन्दन शीत ठिठुरती विदा लेगयी मौसम में आयी गरमाहट कोयल केकी लगे नाचने मानव मन गुंजन की आहट पूनम की चन्दन सी शीतल चांदनी गगन में रही मचल धरती ने ओढ़ी हरित चूनरी ऋतुराजआगमन की हलचल चर अचर सभी में मस्ती छायी अद्भुत ऋतु अनुपम सुख लायी धरती पर खुशियाँ विखरी हैं लावण्यमयी छवियाँ निखरीं हैं सुधियाँ ममत्व की लगीँ उमड़ने आंखों की कोरें लगीं छलकने काश आज वो भी होता "श्री" जिसे पठाया सरहद पर लड़ने श्रीप्रकाश शुक्ल 8 comments
प्रथम प्रविष्टि गांऊं कैसा गीत गांऊं कैसा गीत जो उठकर नील गगन में लहराये मानस के अंतस में घुलकर सागर सी गहराई लाये छेड़े तन मन में उमंग, प्रतिवर्धित करे धैर्य सीमा जन्मभूमि के प्रति मानव में मां से बढ़कर प्रीति जगाये आराधना करूं मां शारद से दे दे मुझको ऐसी शब्दावलि जो स्वयं नियोजित,अवगुंठित हो आड़म्बर में आग लगाये जो खड़े पंक्ति के अन्त छोर, ओढ़े नैरास्य की चादर गांऊं ऐसा गीत जो उनको बरवस विकास धारा में लाये आज समय की मांग कि जब "श्री" आसुरी वृत्तियां आपे से बाहर मेरा गीत जहन में उनके सदबुद्धि की सोच उगाये । श्रीप्रकाश शुक्ल
द्वितीय प्रविष्टि गाऊं कैसा गीत गांऊ कैसा गीत कि जिससे ठंड़ा खून उबाल ले आये जागे सोयी पड़ी अस्मिता, हतप्रभ प्राणी ऊर्जा पाये आज नगर में कोलाहल है गिद्धों के भारी जमघट हैं भूखी जनता के शोषण को जो बैठे हैं ताक लगाये अनविज्ञता कुये के मेढ़क सी, जो सुनती, सही मानती है युक्ति नहीं है कोई जो, हानि लाभ का अन्तर समझाये छीन झपट खाने के आदी वक्र हांकते ड़ीगें अपनी जिससे उनके राज भोज्य, शश समूह स्वयं भिजवाये बिगड़े हालात देखकर "श्री" मन आज सशंकित है कहीं सुशासन शुभकर साधन आसमान नीचे न लाये श्रीप्रकाश शुक्ल
देवों ने धर्म भुलाया है चढ़ते हुए सूर्य को ही, हम सब ने अर्ग्य चढ़ाया है यशोधरा के वलिदानों को, नहीं किसी ने गाया है लक्ष्मण की पत्नी का, अधिकांश नाम तक नहीं जानते, धन्य्वाद कवि श्रेष्ठ गुप्त का, जो परिचय करवाया है तुलसीदास महाकवि हैं, भक्त प्रवर आराध्य राम के पर वो केवल हुलसी थी, जिंसने सदमार्ग दिखाया है उपदेश अनेकों देते हैं, धर्मानुकूल आचरण वरण का पर स्वार्थसिद्धि के हेतु, अनेकों देवों ने धर्म भुलाया है जग की ऐसी रीति रही 'श्री' सभी प्रशंसक रहे शक्ति के शांत भाव, जन सेवा रत जो, अनगाया मुरझाया है श्रीप्रकाश शुक्ल
पूनम की चन्दन शीत ठिठुरती विदा लेगयी मौसम में आयी गरमाहट कोयल केकी लगे नाचने मानव मन गुंजन की आहट पूनम की चन्दन सी शीतल चांदनी गगन में रही मचल धरती ने ओढ़ी हरित चूनरी ऋतुराजआगमन की हलचल चर अचर सभी में मस्ती छायी अद्भुत ऋतु अनुपम सुख लायी धरती पर खुशियाँ विखरी हैं लावण्यमयी छवियाँ निखरीं हैं सुधियाँ ममत्व की लगीँ उमड़ने आंखों की कोरें लगीं छलकने काश आज वो भी होता "श्री" जिसे पठाया सरहद पर लड़ने श्रीप्रकाश शुक्ल
गीत की फसलें नई प्रथम प्रविष्टि भूमि भारत की प्रथक सारे जगत से, गीत और संगीत का मौसम जहाँ पर नित्य पलता । चाहे विजय की खबर हो या निराशा की लहर, संवेदना का सुर, स्वत ही बह निकलता ।। गीत की फसलें नई उगतीं यहाँ, उद्दिगन मन को धैर्य और शान्ति का आहार देतीं । दुख की बदली हो या हो,धूप सुखमय, आत्म व्यंजन उपकरण बन,गीत जीवन गति बदलता ।। चलते हुये जीवन डगर पर आयेंगे झोंके अनेकों,भीष्म व्रत निष्प्राण करने । ऐसे परीक्षा के पलों में,आशीष "श्री" मां शारदा का, इक सुरक्षा कवच बनता ।। श्रीप्रकाश शुक्ल