Sunday, 15 December 2013

बाद दीपावली के दिये ये बुझे 

श्री राम लौटे ,खुशियां बटीं, दिन चार तक ही ये दीपक पुजे  
सीता को घर से निकाला गया, बाद  दीपावली के दिए ये बुझे  
सदियों से अनुभव यही तो रहा, सुख दुःख का मौसम बदलता रहा  
हालात का दास मानव रहा, जैसा ढाला गया, वैसा ढलता  रहा 

उद्धरण और भी हैं अनेकों भरे, इस युग में यही तो प्रमुख रीति है 
जब तक न हो स्वार्थ की पूर्ती, झूठी ओछी  मुखोटे भरी प्रीति  है  
गड़ी फांस निकले या माला पड़े , बाद उसके बदलते रंग ढंग दिखे 
जो सम्बन्ध ऊंचे महल से लगे, रेत की नींव पर सब ही पाये टिके  

जैसी हैं हम प्रजा, वैसा राजा मिले, सियासत का भी अब बुरा हाल है  
थोथे वादों, प्रलोभन से झोली भरें, छल कपट से भरी पूरी हर चाल है 
लोग गफ़लत में हैं, आयेगे दिन ख़ुशी के, दीपावली से भरी रात होगी 
सुख चैन से सब का गुज़रेगा जीवन, सद्भाव की सबको सौगात होगी 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
(२)

बाद दीपावली के दिए ये बुझे

जल गए दीप इक बार जो प्रेम के, ध्यान रक्खें कभी ज्योति घटने न पाये 
कितनीं भी हों आंधियां दुर्विजित, दीप की हर शिखा नूर भर जगमगाये     
प्रगति पथ  पै  बढ़ते कदम देखकर, दुश्मनों के ह्रदय तो अकारण जलें 
वो तो चाहें यही और मनाते भी हैं, बाद दीपावली के दिए ये बुझें  

सदियां गयीं  व्यर्थ लड़ते लड़ाते, बात ये अब  सभी के समझ  आ गयी  
मिल के रहने के परिणाम होते सुखद, अंतत: नीति अपनी सहज भा गयी   
अर्ज़ छोटा मेरा,पर जगत जानता, ज्ञान विज्ञानं की खान, हैं हम असीमित  
खोज मेरी सदा मानसिकता  निखारे, रक्खी नहीं सौख्य साधन पै सीमित  

ये दीपावली जो कि अब मन रही, इसमें दीपक नहीं जो स्वयं बुझ सके 
इनमें ज्योति जले चंचला की सतत, जिसको कोई भी मारुत बुझा न सके  
ज्योति ऐसी ही जग में जलाएंगे हम, भावना अविहित कोई दिल में न आये 
बाद दीपावली के दिए ये बुझे, खयाल ऐसी कभी कोई पलने न पाये   


श्रीप्रकाश शुक्ल 

(३)
बाद दीपावली के दिए ये बुझे 

आयी दीपावली दीप घर घर जले  
दीप जलते हुए कितने लगते भले  

सोचो समझो सभी काम अच्छे करो 
दीप दे ना धुंआ, दूसरों को खले 

बाद दीपावली के दिए ये बुझे  
बात कुछ तो हुयी जो गए थे छले  

जो आज उठता गरजता दिखे 
अधबुझा सा रहे ,जोश निश्चित ढले 

सृजन काव्य "श्री" कोई दुष्कर नहीं 
चोखी संवेदना जो ह्रदय में पले 
 
श्रीप्रकाश शुक्ल  
(४)

बाद दीपावली के दिये ये बुझे 

बाद दीपावली के दिए ये बुझे, रातरानी सिमट कर के मुरझा गयी 
चंहु ओर घर में धुंआ भर गया, सारे अम्बर में काली घटा छा गयी 
पडोसी ने ना पाक चालें चलीं, घुसपैठिये भेज सड़कों पै बम रख दिये 
मौज मस्ती मनाते वो नादान बालक,प्रियजन हमारे जुदा कर दिए 

जगाया जो सोते हुए सिंह को, ठीक लें वो समझ, खैरियत  अब नहीं  
उनके घर में ही घुस हाल पूछेगे हम,मुंह छुपाने को पाएं न कोना कहीं 
धैर्य धारण की होती है सीमा कोई, ऐसी सीमा सभी पार हम कर चुके  
पाठ अब मित्रता का पढ़ाना पड़ेगा, ये शालीनता थी जो अब तक रुके 

था चाहा यही वो मनायें दीवाली, दिये जिसके घर घर को रौशन बनायें 
तान रक्खे जहाँ तार काँटों भरे, वहाँ  पंक्ति दीपों की मिल कर सजायें 
मिलन ईद और जश्न दीपावली का,खुले दिल से यदि साथ में मन सके  
चाहे अम्बर में कितने  ही तूफां उठें, दीप  दीपावली  का  कोई  ना बुझे   

श्रीप्रकाश शुक्ल 
(५)
बाद दीपावली के दिए ये बुझे 

आयी दीपावली झूम उट्ठे सभी,  हर्ष उल्लास की कोई सीमा नहीं 
एक दूजे से मिल प्रतिनन्दन करें, अनबन की चहरे पै रेखा नहीं  
सब की दुआ भाई चारा रहे सब सलामत रहें सभी फूलें फलें 
कोई अकेला क्यों कर जले, हो जलना तो साथ मिलकर जलें 

चाहते सब यही ये नज़ारे ये खुशियां हमेशा हमेशा को ठहर जायें 
प्रेम के पुष्प जो आज मन में खिले, खिलते रहें, मुरझा न पायें 
अमावस भी जीवन की ऐसी रहे जिसमें चमक पूर्णिमा जैसी हो 
दीप दीपावली के कभी न बुझें चाह तूफानों की चाहे कैसी भी हो 

बाद दीपावली के दिए ये बुझे, क्यों बुझे, सोचना अब ज़रूरी हुआ   
क्यों सूखी रही वर्तिका प्रेम की,या सद्भाव का तेल कम क्यों हुआ 
हवायें चलीं घर में विंध्याचली या पश्चिम से आया भयंकर तूफां 
कारण रहा चाहे कोई भी हो हमें रहना सजग जिसको जाने जहाँ 

श्रीप्रकाश शुक्ल  

Monday, 28 October 2013

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये 

दीप सद्भाव के ही निरंतर जलें, पाठ ये हम जगत को पढ़ाते रहे    
राह हर धर्म की साथ में ही चले, राह ऐसी जगत को दिखाते रहे   
समर्थन दिया सत्य को ही सदा, भाल जिससे हमारा कहीं झुक न जाये   
शांति के हम पुजारी की जो साख है,  रक्षित रहे कभी मिटने न पाये      

रखो रोक कर आंधियां प्यार से, जलता दिया कोई बुझने न पाये    
ज्ञान की ज्योति बढ़कर कुहासा हरे, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये  

सम्पूर्ण जग को ही धेरे हुये है, सुनामी अनाचार अनियाउ की 
ललक धन परिग्रह की  इतनी प्रबल, कड़वी लगे राह सद्भाव की 
डर है कभी शिष्टता छोड़कर, मानसिकता न इतनी कहीं डगमगाये 
मूर्ति पावन धरा की जो मन में सजी, दिशाहीनता से सहज टूट जाये 

परवरिश हर चमन की हो इस तरह, कोई अधखिला फूल झरने न पाये  
ज्ञान की ज्योति बढ़कर कुहासा हरे, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये 

समय आगया, हो अँधेरा जहाँ, उस तरफ भी चलें हम कदम दो कदम 
निभाते रहे स्वार्थ को अब तलक, पीर औरों की भी कर सकें कुछ तो कम   
अँधेरे में बिंध अब तलक जो रहा, उसे आज कोई न फिर भूल जाये   
संकल्प लें आज उसके बिना, सौख्य साधन न जीवन का कोई सुहाये  

आस अक्षुण रहे हम अकेले नहीं, कोई हार कर जिन्दगी न बिताये 
ज्ञान की ज्योति बढ़कर कुहासा हरे, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Sunday, 13 October 2013

वेदना पर चेतना की जीत होगी

जिन्दगी में सुख-दुःख के पल, सतत आते गुजरते 
नभ में दिखी लाली कभी, देखे कभी तारे बिखरते   
उद्देश्य जीवन का समझ, समभाव से जिसने जिया  
नदिया दुखों की पार कर, आनंद जीवन का लिया 

जो मध्य पथ में रुक गया, कैसे कहूं था कर्मयोगी 
वेदना पर चेतना की जीत होगी 

दबकर व्यथा के भार से, विश्वास खो देता है मन 
आशायें बुझती सी दिखें, ध्वस्त दिखते सब सपन 
ऐसे समय पर शान्त्वना के शब्द लगते अति भले 
चेतना यदि जाग जाये, कम चुभन दुःख की खले 
         
नैराश्य में जो रंग भरे वो प्रीति की ही रीति होगी 
वेदना पे चेतना की जीत होगी 

रोना, रोना व्यथा का, दिखती न कोई समझदारी 
लोग करते हैं हंसी, लेता  ना  कोई  हिस्सेदारी
ये आपदायें क्षणिक तो, गहरायेंगी, डरपायेंगी 
पर चेतना हो बलवती, तो खुद व खुद मिट जायेंगी  

पग रहें गतिमय अगर, हर थाप पग की गीत होगी
वेदना पर चेतना की जीत होगी 

श्रीप्रकाश शुक्ल 





वेदना पर चेतना की जीत होगी 

परिवेश सारे जगत का,आज चिंताजनक है 
द्वेष की चहुँ ओर ही, देती सुनाई खनक है
अनुदारता  की भावना,हर ह्रदय में पल रही  
प्रतिशोध की ज्वाला, द्वार पर ही जल रही 

दुःख दारुण हो निवारण कौन सी वो नीति होगी 
वेदना पर चेतना की जीत होगी 

अह्सास सुख और दुःख का मानसिक इक कृत्य  है 
अंतर न कर पाना, निपट अवबोध का अल्पत्व है  
संज्ञान कर जो परिस्थिति, ले सका निर्णय सही 
जिन्दगी की डगर उसकी, सदा ही उज्ज्वल रही 

यदि सजग, तो पूतना अनुसाल की  होगी 
वेदना पर चेतना की जीत होगी

क्या  हुआ जो आज सारे मूल्य थोथे पड़ गए 
स्वार्थ रक्षण हेतु सब सदभाव  मैले  पड़ गए 
तन मनन की सहज वृत्ति आज रूठी सी पड़ी 
सम्पूर्ण जग को निगलने,समय की सुरसा खड़ी 

विश्व शांति  सृजन में  सद्भावना  ही मीत होगी 
वेदना पर चेतना की जीत होगी

श्रीप्रकाश शुक्ल 


पग में गति आ जाती  है छाले  छिलने से

पग में गति आ जाती है, छाले  छिलने से 
सोई उर्जा जग जाती है मात्र चुनौती मिलने से  

जीवन में संघर्ष कभी बेकार नहीं जाता है  
पत्थर कट जाता है, अविरल रस्सी चलने से 

सोना तपकर ही आभूषण में ढलता है 
सिंहपुत्र होता बलशाली केवल जंगल में पलने से 

कड़ी धूप में तपने से चहरे का रंग निखरता है  
हिना रंग भर लाती है, घुटकर दलने से 
 
अवरोधों से लड़कर ही जीवन का सुख मिलता है 
दाने अनाज के खिल उठते हैं,जलने  से 
 
कितना दुष्कर होता है एकाकी जीवनयापन  " श्री "
आशाएं बुझी पनपतीं है, साथी मिलने से 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
पग में गति आ जाती  है छाले  छिलने से

पग में गति आ जाती है छाले  छिलने से 
निद्रित कुब्बत जग जाती है आहव मिलने से  

जीवन में संघर्ष कभी बेकार नहीं जाता है  
पत्थर कट जाता है, अविरल रस्सी चलने से 

सोना तपकर ही आभूषण में ढलता है 
सिंहपुत्र होता बलशाली केवल जंगल में पलने से 

कड़ी धूप में तपने से चहरे का रंग निखरता है  
हिना रंग भर लाती है, घुटकर दलने से 
 
अवरोधों से लड़कर ही जीवन का सुख मिलता है 
दाने अनाज के खिल उठते हैं,जलने  से 
 
कितना दुष्कर होता है एकाकी जीवनयापन  " श्री "
आशाएं बुझी पनपतीं है, साथी मिलने से 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
पूज्य भाई जी के चौथे निर्वाण दिवस पर श्रद्धा सुमन 

हर सितम्बर माह में आवाज़ इक आ गूंजती, आ गूंजती 
बन्धुओ मिलकर रहो, मिलकर रहो, मिलकर रहो  

भौतिक सुखों की चाह का अंत कोई भी नहीं,  
पाओगे जितना ही, उतना लोभ बढ़ता जाएगा, 
संभव नहीं तुम कर सकोगे, लालसा मन की सफल 
शांति मन की दूर होगी, हाथ कुछ न आयेगा

हर सितम्बर माह में आवाज़ इक आ गूंजती,आ गूंजती,  
पंथ सेवा का गहो, परमार्थ का ही पथ गहो 

जीवन डगर है बहुत मुश्किल, अडचनें पग पग खड़ी  
पार कर लोगे अकेले, ये तुम्हारी भूल है
साथ ले सब को चलोगे, रास्ता कट जाएगा 
सोच आधारित अहम् पर, सर्वथा निर्मूल है  

हर सितम्बर माह में आवाज़ इक आ गूंजती,आ गूंजती, 
साथियो मिलकर चलो, मिलकर चलो मिलकर चलो 

आवाज़ ये उसकी नरों में, जो रहा उत्तम सदा, 
काम औरों का रहा, अपने से बढ़कर सर्वदा  
भाव सेवा का समेटे, जो सिमट कर खुद रहा 
आज उसको ह्रदय मेरा, नमन शत शत कर रहा 

हर सितम्बर माह में आवाज़ इक आ गूंजती, आ गूंजती 
बन्धुओ मिलकर रहो, मिलकर रहो, मिलकर रहो  

                               समस्त परिवार   
                              २१ सितम्बर २०१३