Saturday, 15 December 2018

पूजा क्या ,किसकी और  क्यों?
मेरी पूजा की थाली में

पूजा लौकिक विधि धरती पर
स्तुति कर कृतज्ञता दर्शाने की
उनके प्रति, जिसको सत्कर्मों से,
निष्ठा,भक्ति मिली जमाने की

पूजा का पात्र वही होता है
जिस पर श्रद्धा होती है
श्रद्धाभाजन है वो शक्तिकेन्द्र
जिसको हठ क्लेष मिटाने की

मेरी पूजा की थाली मेंं
मणि मुक्ता हीरे भले न हों
पर भक्तिभाव से चुने द्रव्य 
मेंं, होगी शक्ति मनानै की

पूजा में बहे नदी आदर की
प्रेम का सागर लहराता हे
दोनों में निहित भाव अर्पण
का, रखता सामर्थ रिझाने की

रूप पूज्य  के आदर्शो का, स्वयं
बिखरता, उसके खुद के कर्मतन्तु से, 
मिलकर, उठ बन मेघपुष्प "श्री"
ऋतु लाता खुशियाँ पाने की

श्रीप्रकाश शुक्ल


मेरी पूजा की थाली में

प्रभु पूजा, दिव्य साधना है
अपने अन्तस के शुध्दिकरण की
तन, मन कृतित्व.यदि साफ रहेंं
तो वांछित परिणाम सरस होंगे

जग मेंं गतिविधियाँ रहस्यमयी
संभव, मानव कुछ समझ भी ले
पर भीषण दैवीय प्रकोपों के
सन्मुख हम सभी विवश होंगे

मेरी पूजा की थाली मेंं
हो सकता बहुमूल्य द्रव्य न हों
पर भक्तिभाव, श्रद्धा से पूरित
उर के उदगार अवस होंंगे

कल्पना, जगत के मालिक की
हो सकता महज़ कल्पना हो
पर उसके आराधन के फलीभूत
मन उर्ज्वसित, शुभ्र दिवस होंगे

पूजा से अहं नष्ट होगा
मन असीम ढ़ाढ़स पायेगा
होगा आभास सहारे का "श्री"
अवसाद, तनाव निरस होंगे

श्रीप्रकाश शुक्ल





















 

क्या करोगे अब बनाकर

क्या करोगे अब बनाकर चित्र मेरी जिन्दगी का
हर प्रष्ठ ही कालिख भरा, गिरवी रहा जो किसी का

खुबसूरती खुद नारि की सबसे बड़ी दुश्मन रही 
केन्द्र चाहत का बनी ऐसा न जिस पर बस किसी का

आज मैं भी "Me Too"  कह कर, यदि सडक पर उतर आऊँ
तो क्या बापिस पा सकूंगी, हर पल जो खोया चैन जी का 

कितनी असह थी वेदना, जब किसी ने ज्यादती की 
और मैं बस चीखती, सहती रही,परिणाम अपनी बेबसी का

मैं अगर बनकर "किरण " "उस अकबर का सीना तोडती "श्री"
तो आज फिर इस जगत मेंं, नारी न खाती भय किसी का 

संदर्भ: किरण सती ने अकबर की छाती पर चढ़कर मीना बाजार बन्द करवाया था ।

श्रीप्रकाश शुक्ल
 


 

क्या करोगे अब बनाकर

क्या करोगे अब बनाकर,
स्वयं के मानक बड़े
जब कटोरा हाथ लेकर
सड़क पर चिन्तक खड़े ।

काम कुछ मिलता नहीं 
सब परिश्रम व्यर्थ है,
दो जून की पाने को रोटी
घर घर मेंं अब लाले पड़े ।

नीतियां बाहर की भी
निष्क्रिय निर्रथक हो रहींं,
समझा रहे हैं उन्हें, जो
हैं जन्म से चिकने घड़े ।

क्या करोगे अब सुझाकर, 
सम्वाद से ढ़हतीं दीवारें,
झुठला के सच, बे बात ले
अपनी जिद पर जो अड़े ।
 
क्या करोगे अब बढाकर 
हाथ उनसे दोस्ती का,
भर कुटिलता हृदय मेंं
षडयंत्र जो अनगिन गढ़े ।

सार्थक होगा यही " श्री"
अपने घर पर ध्यान दें, 
असहिष्णुता, दुष्कर्म पर
हों नियम अतिशय ही कड़े ।

श्री प्रकाश शुक्ल