Monday, 25 April 2016

पाषाण में भी प्राण

सोये हुए क्यों? कवि उठो ! दर्प को दर्पण दिखाओ
नैराश्य ओढ़े भूमि गत जो, हाथ दे उनको उठाओ  
स्वार्थ की संकीर्णता में, इंसानियत जो आज भूले 
झकझोर कर उन पशु सरीखे मानवों में प्राण लाओ 

क्यों धार कुंठित है कलम की वेदना लिखती नहीं 
है कलंकित मानसिकता फिर भी क्यों दिखती नहीं 
देश पर था गर्व जिनको आज क्यों निष्प्राण दिखते 
फूंक दे पाषाण में भी प्राण जो, संवेदना ऐसी जगाओ 

है देश में भीषण परिस्थिति, आज तरुणाई भ्रमित  
झूठे छलावे में उलझ, समझे न अपना हित अहित 
हो दुखित भूषण औ दिनकर, खीजकर  पैगाम देते   
शब्द शर में गर्जना  भर भ्रान्ति की तुम भित्ति ढाओ 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

 

Thursday, 7 April 2016

रंग चुरा कर
 
रंग चुरा कर इंद्र धनुष से रगीं तिरंगी चुनरी एक,  
इस चुनरी को ओढ़ मादरे वतन बनी भारत माता 
वेदों ने उद्घोष किया "'माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या," 
भारतवासी का इस माँ से हुआ यही स्थापित नाता 

आओ इतिहास पढ़ें अपना कैसे जन्मी भारत माता,
लिपटाये बाँकुरे राष्ट्र के अपने पावन आँचल में  
स्वीकारा सब ने इसको राष्ट्रीय एकता का प्रतीक, 
सभी धर्म के अनुयायी स्वेच्छा से जुटे शरण स्थल में  

इस माँ ने हर भारतीय को एक सूत्र में बाँध रखा है, 
और दिए हैं एक भाव से पलने, बढने  के अवसर 
हर बालक भी इस माँ के प्रति रखता है अटूट श्रद्धा, और सदा सम्मान दिया है अपनी जननी से बढ़कर 

पर कुछ भटके युवक, किसी झूठ बहकावे में आकर,  
जीवन का सद मार्ग छोड़ अपनी जिद पर अड़े हुए हैं 
भारत माँ की जय न कहेंगे ऐसा अड़ियल रुख लेकर  
देश तोड़ने की  विधि से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं 

मत भूलो ! हर भारतीय के दिल में भारत बसता है
इसकी अखंडता पर कोई भी आँच न आने पायेगी    
ऐसे कुत्सित प्रयास उगते ही कुचल दिए जायेंगे
भावना एकता की सदैव अमर बेल सी लहरायेगी 

इससे मंतव्य मेरा मानो, मत छेड़ो ये चिंगारी तुम  
भडक गयी तो फिर ये तुमसे नहीं संभाली जायेगी 
अपना तो सर्वश्व नाश कर बैठोगे ही बिन कारण 
सारी पृथ्वी पर भारत की छवि धूमिल कर जायेगी 

 श्रीप्रकाश शुक्ल 
फागुन का

एक  वर्ष में एक बार ही, आता  है फागुन का महिना 
प्रेम रंग रस की गठरी ले  आता है फागुन का महिना 
प्रकृति नटी बस  एक बार ही करती है  सोलह श्रृंगार 
हर प्राणी के तन अरु मन में भर देती निस्सीम प्यार 

 फूलों से लदे पेड़ विलसें , बौर  भरें कामांग डालियाँ  
 ओढ़े  धरा वसंती साड़ी , झूमें  गेहूं की पकी बालियां 
 हो मदहोशी में डूबा मन, चाहत थिरकन की पावों में 
 ढोलक की थाप भरे मस्ती, मल्हर राग भरे गांवों में   

 दिव्य रश्मियाँ दिनकर की, अनुभूति सुखद दें प्राणों को 
 उर उकसी उमंग की लहरें ऊर्ज्वसित कर दें अरमानों को 
 हर प्राणी के रोम रोम में जब मस्ती भरे बयार का झौका 
 दस्तक देता खड़ा द्वार पर समझो तब खुमार फागुन का   

  रंगरस की ऐसी मादकता फागुन में छाती कण कण में
  कपट द्रोह की सकल भावना मिट जाती है क्षण भर में 
  मंगल भाव उमड़ते उर में, मन में भर  इठलाता उजास 
  कुसुमाकर आकर फागुन में, करता प्रदीप्त हर नयी आस 

  ग्यारह महिनों की थकान जाता मिटा माह फागुन का 
  नर नारी सब ही के मन को, जाता रिझा माह फागुन का 
  प्रेम मुदित कर सार्थक करता फागुन सर्वविदित महिमा 
  जिस गौरव से रचा प्रकृति ने, पूरित करता सारी गरिमा 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

तोड़कर बंधन

तोड़कर बंधन अगर तुम चाहते बाहर निकलना,  
तो जरूरी जानना होगा तुम्हें बांधे हुए क्या है । 
जीव अपने आप में है पूर्णतः बंधन रहित ,
जब तलक अस्तित्व अपना देह से रखता जुदा है ॥ 

संभव नहीं मानव, जगत में रह सके निर्लिप्त हो,
अनुबंध माया मोह के अनिवार्यतः रखते जकड । 
ऐसी  दलदल से स्वयं को खींचना बाहर अगम, 
व्यर्थ होतीं कोशिशें, और भी मज़बूत हो जाती पकड़ ॥ 

भाव कर्ता का भुला , समभाव हो हर द्वनद में, 
चित्त को एकाग्र कर ,यदि व्यवस्थित कर  सको । 
तो ये संभव है कि हो उन्मुक्त सारे बंधनों से ,
अर्थ जीवन का सही साकार भी तुम कर सको ॥ 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
समा गया  तुम में 

जिस दिन तुमने घूंघट पट से देखा सहसा उसे पलटकर  
समा गया तुम में था उसका सारा जहाँ उसी पल घुल कर 

सागर जैसी आखों की तह तक तो पहुंचना सहज न था  
पर चितवन की ख़ूँ-ख़्वारी से कैसे लड़ सकता था डटकर 

सोचा न कभी, पहली प्रतीति ही ऐसी रंगत ले आएगी 
असहज रहेगा जीवन यापन, बीतेंगी रातें तारे  गिनकर 

पता नहीं केवल चितवन थी या फिर संग में इशारात थे 
पल में होश गवां बैठा जो  झलक एक उस छवि की पाकर 

सम्मोहन शक्ति नारी की, चपला से चंचल कही गयी है    
एक चोट जो खा लेता " श्री " जीता है वो तड़प तड़प कर 

श्रीप्रकाश शक्ल 

समा गया तुम में

समा गया तुम में भी प्रभुवर, भाव वही जाना पहचाना 
छप्पन भोग खिला सकता जो, बस उसके ही घर जाना 

पूजा अर्चन आज ईश का काफी कठिन नज़र आता है 
सामर्थ नहीं है इक गरीब की, अभ्यर्चन करवा पाना 

अब तक आप कहे जाते थे दीन और दुखियों के साथी 
अब इस युग में सीख लिया है राज मुकट पर इतराना 

एक अकेले पूजा घर में, अरबों खरबों की  दौलत है 
अब कैसे तुम्हें राज आएगा शबरी के घर जूठा खाना 

इसी लिए तो आज सुदामा भी विस्मित हो सोच रहा है 
क्यों न अपने भगवान बदल लूँ  छेड़ूँ मैं भी नया तराना 

भक्त और भगवान बीच की दूरी अब बढ़ती दिखती "श्री "
भगवांन  हो गए धनिकों के अब बदल लिया ताना बाना 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
इस पनघट पर तो

भारत  है  इक  मात्र  देश सरिताएँ जहां पाप क्षरतीं हैं  
इनके घाटों पर भक्तों  की  निष्ठाएँ  नर्तन करतीं हैं  

घाट सभी पूजास्थल हैं ,अतुल सौम्यता के अनुरूपक  
जल में बिंबित रवि किरणें, मन की अस्थिरता हरतीं हैं  

आस पास की नगर मानुषीं, जब इन घाटों पर आतीं हैं 
तिरछी अटकीं मटकियां कमर पर छटा दिव्य सी भरतीं हैं 

लगता  है  इस पनघट पर तो  साक्षात  अप्सराएं  उतरीं हैं 
जिनकी  मधुर  हंसी में, नव पुष्पित पंखुरियां  झरतीं हैं 

ये  रुचिर घाट  भारत के "श्री "भारत  की  जीवन  रेखा  हैं 
इन पर निर्भर गतिविधियाँ ही असली कथा बयां करतीं हैं  

श्रीप्रकाश शुक्ल