Saturday, 26 July 2014

समय चक्र की गति से 

जीवन क्रम के समय काल में मौसम के बदलते फेरे हैं 
मिलती कभी धूप हंसती सी कभी बदलियों के घेरे हैं 
अक्सर यही सोचते हम मेरे ही घर क्यों गाज गिरी 
मेरे हाथों से तो कभी, सपने  में  भी चीटी  न मरी 

पर क्योंं नहीं समझ पाते  समय चक्र की गति अबाध है 
भूत भविष्य और वर्तमान में होना  इसका  निर्विबाद है 
शायद यही मूल कारण है अनवरत चक्र चलता रहता है   
और नियति की मार हर कोई, कर्मानुसार  ही सहता है 

पर जब समय चक्र की गति से तारतम्य बन जाता है  
तो फिर मंजिल बने सुगम फल श्रम का मिल जाता है  
वो विचार सब से बलशाली जिसका "समय"आ गया है 
जिसने सुख दुःख हँस कर झेला जीने का अर्थ पा गया है 
 
श्रीप्रकाश शुक्ल 

Tuesday, 22 April 2014

पूज्य भाई जी की तृतीय पुण्य तिथि पर अंजलि भर प्रेम पूरित सुमन 

आज आपकी पुण्य तिथि पर, हम सब फिर एकत्रित हैं
मनन कर रहे मधुर संदेशे, मनस पटल पर जो  चित्रित है
तीन बरष बीते यद्यपि पर, आशीष आपका  सदा मिला  
वेदान्त मिशन का संवल ले, जीवन यापन भी सुखद चला

लेखा जोखा आज दे रहे, चमन आपका महक रहा है 

बन्धु बांधव सभी सुखी हैं, कुनबा सारा चहक  रहा है 
भईया गोपाल, रोहिणी  ने मिल, कार्य अधूरा निपटाया है 
राम और गीता निवास को,  सुन्दर  इक, नीड़ सजाया है 

वायुयान  में बिठा बेटियाँ ,संबंधों से  मिलातीं हैं 
रक्षाबंधन पर बहिनों की पलकें गीली हो जातीं हैं 
सत्यप्रकाश, श्री, राम दत्त, नित याद आपकी करते हैं 
और प्रभा जी  के आंसूं खुशियों में भी छलक पड़ते  हैं
गौरव, समीर निज गरिमा से गुलशन की शान बढ़ाते हैं
शाश्वत, चिन्मय चाव सहित अध्ययन में ध्यान  लगाते हैं
अक्षय  और शहाना ने चुन, नव जीवन लक्ष्य बनाया है
मंदिरा, पर्णिका, स्तुति ने परचम ऊंचा लहराया है 

हमें ज्ञात है आप वहां पर, बंधन मुक्त प्रफुल्लित हैं 
दिव्य गुणों से पूर्ण मनुज पा, देव सभी  भी हर्षित हैं
प्रेम और श्रद्धा से पूरित अंजलि भर पुष्प चढ़ाते हैं हम 
आप वहां पर रहें अनिश्चित, प्रभु से यही मनाते हैं हम 

समस्त परिवार 
२१ सितम्बर २०१२ 


पूज्य भाई जी के चौथे निर्वाण दिवस पर श्रद्धा सुमन 

हर सितम्बर माह में आबाज़ इक आ गूंजती, आ गूंजती 
बन्धुओ मिलकर रहो, मिलकर रहो, मिलकर रहो  

भौतिक सुखों की चाह का अंत कोई भी नहीं,  
पाओगे जितना ही, उतना लोभ बढ़ता जाएगा, 
संभव नहीं तुम कर सकोगे, लालसा मन की सफल 
शांति मन की दूर होगी, हाथ कुछ न आयेगा

हर सितम्बर माह में आवाज़ इक आ गूंजती,आ गूंजती,  
पंथ सेवा का गहो, परमार्थ का ही पथ गहो 

जीवन डगर है बहुत मुश्किल, अडचनें पग पग खड़ी  
पार कर लोगे अकेले, ये तुम्हारी भूल है
साथ ले सब को चलोगे, रास्ता कट जाएगा 
सोच आधारित अहम् पर, सर्वथा निर्मूल है  

हर सितम्बर माह में आवाज़ इक आ गूंजती,आ गूंजती, 
साथियो मिलकर चलो, मिलकर चलो मिलकर चलो 

आवाज़ ये उसकी नरों में, जो रहा उत्तम सदा, 
काम औरों का रहा, अपने से बढ़कर सर्वदा  
भाव सेवा का समेटे, जो सिमट कर खुद रहा 
आज उसको ह्रदय मेरा, नमन शत शत कर रहा 

हर सितम्बर माह में आबाज़ इक आ गूंजती, आ गूंजती 
बन्धुओ मिलकर रहो, मिलकर रहो, मिलकर रहो  

                               समस्त परिवार   
                              २१ सितम्बर २०१३ 
पूज्य भाईजी की मधुर स्मृति में श्रद्धा  सुमन

परिवार जनों के सुदृढ़ संबल
                      मित्र जनों के परम मित्र |
करुणा की साक्षात मूर्ति
                     सौहाद्र पूर्ण जीवन पवित्र |
कर्तव्य पथ पर अडिग निरंतर
                     सदा सत्य के अनुयायी |
दुखियों की जीवन गाथा सुन
                     जिनकी आँख सदा भर आयी |
सदा खोजते रहे स्वयं को
                     कर्म ज्ञान से पूर्ण व्यवस्थित |
कभी न विचलित अपने पथ से
                     चाहे जैसी बनी परिस्थिति |
जीवन के सार्थक मूल्यों को
                     आत्मसात कर खूब निभाया |
स्वयं प्रमाणित आवग्रत हो
                    छोड़ी सब पर अमिट छाया |
नहीं शब्द जो प्रकट कर सकूं
                    जो कुछ मैंने उनसे पाया |
कैसे भूलूँ उस दिव्य अंश को
                    जिसने सदा प्रेम बरसाया |
हमें गर्व भाई जी तुम पर
                    फिर भी मेरा मन अशान्त |
अंतिम प्रणाम स्वीकृत हो मेरा
                    पाओ अव्यय परम शांति |


        गीता-श्रीप्रकाश 


Sunday, 13 April 2014

जीवन के ढाई आखर को

     जिसने पढ़ा लिखा समझा जीवन के ढाई आखर को 
  जिसने बांटा दर्द, किया साझा औरों की शंका,डर को 
  जिसके भर आये नयन  देख गीली  आँखें औरों की 
  जिसको कसकी पीर हमेशा  अपनी सी ही गैरों की  
  
  जिसने बढ़ती हुयी घृणा को आड़े हाथ लिया है 
  जिसने कोमल भावों का बढ़ चढ़कर साथ दिया है 
  सच पूछो तो उसने ही जीवन का मरम जिया है 
  उसने ही जीवन घट में अमृत रस पान किया है 

   वो मनुज नहीं है देव तुल्य है या कोई अवतारी है 
   औरों के दुःख को जीना उसकी अपनी लाचारी है 
   वो आता है इस जग में केवल एक मसीहा बनकर    
   और लौट जाता है, जग को सन्देश प्रणव का देकर  

श्रीप्रकाश शुक्ल 

जीवन के ढाई आखर को

जीवन के ढाई आखर को जीवन में आज उतरने दें  
दुर्भावों की दावानल को दें बुझा न और पनपने दें  
ये आखर तो युग युग से रहे सनातन अजर अमर हैं 
भाषा कोई भी रहे मगर अनुभूति, बोध, इक  स्वर हैं  

इन शब्दों में रहा समाया विश्वास भरोसा और समर्पण 
बंधन सब ही नश्वर होते जब खींच बाँध लेता आकर्षण 
धीरे धीरे सहृदयी सोच बदल जाती अशरीरी एहसासों में   
भाव पराये अपने का फिर नहीं समाता उच्छ्वासों में 

ये प्रेम पगे ढाई अक्षर जो आत्मसात कर अपनाता है 
वो जाति धर्म रंग के विभेद को बिन प्रयास झुठलाता है 
आवश्यक है आज जगत में हम सब ऐसा परिवेश बनायें  
समरसता की पैनी किरणों से कटुता के बादल छटते जायें   

श्रीप्रकाश शुक्ल 
रचे तोरण और बन्दनवार तेरे आगमन को

रचे तोरण और बन्दनवार तेरे आगमन को 
बैठे रहे पलकें बिछाये पथ तुम्हारे हम प्रतीक्षित 
तुम न आये लौटकर मोहन मदन,मेरे सखे 
कैसे बताएं किस तरह हम जी रहीं सखियाँ दुखित   

अश्रुओं की धार जब से तुम गये टूटी नहीं हैं 
याद पल भर भी तुम्हारी ह्रदय से छूटी नहीं है  
सूना पड़ा वो यमुन तट ग्वाल सब बेचैन हैं 
झलक पाने को तेरी निश दिन तड़पते नैन हैं 

आज उद्धव जी पधारे ज्ञान दें निर्लिप्तता का 
हम अनंगी प्रेम प्यासे क्या करें उस विद्वता का 
जिसको सुनकर पीर मन की तनिक भी घटती नहीं
मूर्ति जो दिल में गढ़ी तिल मात्र भी हटती नहीं   

आप हमको भूल जाएँ पर न सकते भूल हम 
दूरियां कितनी बढ़ें अनुरक्ति पर होती न कम 
हम पथिक हैं प्रेम पथ के प्रेम ही बस सार है 
जो न प्रिय के साथ हों तो जिंदगी निस्सार है  


श्रीप्रकाश शुक्ल