Sunday, 5 January 2020

नोट:  
सतत प्रयासों के झोंके निश्चय ही परिवर्तन लायेंंगे ।
आशान्वित हैं भावी पल कुछ ऐसा लिख पायेंंगे ।।

जो खुला आकाश स्वर मेंं
बांध बैठे हैं हम, जो खुला आकाश स्वर मे ं।
जिन्दगी अब गीत है, रुसवायियों की डगर मेंं ।।

माहौल बदला है यहाँ, स्वच्छन्द पत्ते ड़ोलते हैं,
कुहासे में नहीं पलता कोई तरु,  आजकल इस शहर मेंं ।।

लहलहाते खेत हैं, वादियों में फूल हैंं हर मोड़ पर,
खिलखिलाती निरख कलियां, उत्साह है हर भंवर मेंं ।।

न्याय संगत विविध निर्णय, हो रहे जिस तीब्रता से,
सारी दुनिया चकित है, क्या हो रहा इस नगर मेंं ।। 

पर्वत सी घृणा उर में, नहीं पाती है पोषक तत्व अब "श्री"
पिघलती जाती गल गल कर,भ्रातृत्व की उमड़ी लहर मेंं।।
  
श्रीप्रकाश शुक्ल

नोट:  
सतत प्रयासों के झोंके निश्चय ही परिवर्तन लायेंंगे ।
आशान्वित हैं भावी पल कुछ ऐसा लिख पायेंंगे ।।

जो खुला आकाश स्वर मेंं
बांध बैठे हैं हम, जो खुला आकाश स्वर मे ं।
जिन्दगी अब गीत है, रुसवायियों की डगर मेंं ।।

माहौल बदला है यहाँ, स्वच्छन्द पत्ते ड़ोलते हैं,
कुहासे में नहीं पलता कोई तरु,  आजकल इस शहर मेंं ।।

लहलहाते खेत हैं, वादियों में फूल हैंं हर मोड़ पर,
खिलखिलाती निरख कलियां, उत्साह है हर भंवर मेंं ।।

न्याय संगत विविध निर्णय, हो रहे जिस तीबृता से,
सारी दुनिया चकित है, क्या हो रहा इस नगर मेंं ।। 

पर्वत सी घृणा उर में, नहीं पाती है पोषक तत्व अब "श्री"
पिघलती जाती गल गल कर,भ्रातृत्व की उमड़ी लहर मेंं।।
  
श्रीप्रकाश शुक्ल
जो खुला आकाश स्वर मेंं

जो खुला आकाश स्वर में स्वच्छंदता से गूंज पाता ।
सो रहे आलस्य से जो, झकझोर कर उनको  जगाता ।।
फिर उठ रहे हैं जो कदम दुर्भावना के द्वेश मेंं ।
निर्मूल कर उनको सहज सदभाव का विस्तार लाता ।।

मुंह पर लगे ताले, रुह को झकझोरते हैं ।
ज्वाल उठता हृदय मेंं मन का संयम तोड़ते हैंं ।।
कितना कठिन है देश की तरुणाई को  बांध रखना .
समझ पाती जो सियासत, सरल होता शान्ति रखना ।।

बात छोटी भले हो, पर शीघ्र बनती एक बबन्डर ।
एक चिनगारी लगाकर राख करती 
सैकड़ों घर ।।
पूर्व आग्रह  उमड़कर  प्रतिशोध की ज्वाला जलाते ।
इक शान्त वातावरण को  रणभूमि की संज्ञा दिलाते  ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल
जाल सन्नाटे निरन्तर बुन रहे हैं

आज अपनी गफलतों पर, हम सभी  सर धुन रहे हैं 
क्या पता था, जाल सन्नाटे निरन्तर बुन रहे हैं ।।

असहिष्णुता का रोग जग में, आज अपने चरम पर है
और हम इसको भुला वर्चस्व का पथ चुन रहे हैं।।

सम्पत्ति, सुख साधन अकेले, शान्ति दे सकते नहीं
सद्भाव, मीठे बोल और सदव्यवहार ही सदगुन रहे हैं ।।

देश के कर्मठ तरुण,अब प्रतिभा परीक्षण में जुटे हैं
परिणाम होंगे दूरगामी. मनीषियों से  सुन रहे हैं ।।

विज्ञान से सम्भव है, बस में शक्तियां दैवीय हों  "श्री"
पर उनके गलत उपयोग से परिणाम दुख दारुन रहे हैं ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल
तुम मुझको जगाकर जगमगाओ

देश के मैं साथ हूँ प्रगति पथ पर, फर्ज़ बस इतना निभाओ।
जो पंथ में झपकी लगे, तुम मुझको जगाकर जगमगाओ।।

काटों भरा था रास्ता, अपनों ने ही कांटे बिछाये ।
अब भी भ्रमित है मानसिकता, आकर उन्हें सत पथ दिखाओ।।

ये बुलावा उनको है, हैं जो घर के सजग प्रहरी
रख प्रेम के बल पर भरोसा, रूठे हुओं को आ मनाओ ।।

दिलों को जोड़ पाता है नहीं, तर्क से जीता हुआ मसला,
जरूरत है मोहब्बत से सनी, कोई भी हिकमत आजमाओ।।

लाज़िमी है अहं से उठकर सभी, बड़प्पन खुद का दिखलायेंं
गफलत से, विखर जायेगा घर, मत बेबजह मौका गंवाओ ।।

 श्रीप्रकाश शुक्ल

देखकर हैरान होते 
जिस तरह फैला हुआ है आज सारे जग मेंं गम,
देखकर हैरान होते, डगमगाता हर कदम ।।

आपदाएं प्राकृतिक और कुछ खुद की रचीं 
फैला रहीं सुरसा सा मुंह, ह़ोतीं नहीं  हरगिज़ भी कम ।
 
सारे. मनीषी जानते हैं ,दुख का कारण.है क्या  ,
तीन तापों के जनक और मुख्यतःकारण, हैं हम।।

गल्तियां करते हैंं हम, अज्ञानवस या हो अचेतन
पालते  इच्छाएं अनगिन.कम न होता जिनका क्रम

आनन्द से गुजरे ये जीवन,  है मात्र साधन एक ही " श्री"" 
 सच में जियो ,छोड दो, हो धन पै निर्भर सुख से जीने का भ्रम

श्रीप्रकाश शुक्ल

यह अपनी अपनी किस्मत है 

कोई गोताखोर सहज ही सागर मेंं मोती पाता है ।
वहीं दूसरा सागर तल में पत्थर से टकरा जाता है ।।
 
कोई तैराक सरलता से ही, नदी पार कर जाता है ।
वहीँ दूसरा भंवर मेंं फंस कर अपनी जान गंवाता है ।।

कहते कोई कारण होगा, यह अपनी अपनी किस्मत है ।
किसी के तारे डूबे हैं, कोई रब की रहमत पाता है ।।

पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, इस मत को नहीं  मानता.है ।
कहता कर्म, कला, कौशल का इन सबसे गहरा नाता है ।।

ग्रहदशा, हस्त रेखाएं जो किस्मत इंगित करतींं हैं ।
इक कर्मवीर उनको झुठला कर अपना मार्ग बनाता है ।।

अपने प्रिय चन्दा मामा, जो सागर मेंं हलचल करते थे।
"प्रज्ञान" आज उनके घर बैठा पल पल का हाल बताता है ।।

पुरुषों के अलावा अन्य जीव जो प्रकृति गोद मेंं पलते हैं ।
किस्मत की बदौलत उनके जीवन मेंं अन्तर ख़ास नहीं आता है ।।

हां, किस्मत को कारक कहने से शान्त्वना भाव मन आता है ।
पर ये केवल मन का भ्रम है, कारण सही न मिल पाता है ।।

जो किस्मत पै भरोसा रखना चाहेंं, रक्खेंं कोई हर्ज़ नहीं। 
पर पुरज़ोर कर्म करने मेंं ही "श्री" जीवन का सुख आता है ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल