Sunday, 5 January 2020

प्यार का पट खोलता है

मुंंडेर पर बैठा कबूतर का जोड़ा गुटरगूं गुट बोलता है ।
हिय में जगाता टीस सी, प्यार का पट खोलता है।।

नभ से छिटककर चांदनी आंगन में आ जब पसरती है ।
याद प्रीतम की दिलाती, बिरहिन का तन मन डोलता है ।

सर मेंं थिरकतींं मछलियां लहरों के संग जब खेलतीं हैं 
परिदृश्य सुधि में ला विगत पल, प्यार का रस घोलता है

अतिशय मधुर है जिन्दगी मेंं, प्यार के पट खोल जीना,
ऐसे जीवन को जगत, स्वर्ग सम ही तोलता है ।।

जो हृदय तज द्वेश ईर्ष्या अहं "श्री". सौहार्द का अनुसरण करता, 
वो साफ सुथरे तन में रह कर प्यार का पट खोलता है ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल
प्राण मेंं मेरे समायी

यह भूमि, वीरों ने जहाँ, रीति कुछ ऐसी निभायी ।
देश प्रति निष्ठा सदा, जो प्राण मेंं मेरे समायी ।।

दिल दहलता याद कर राणा की वो कुरवानियां । 
भूखे बच्चों को जहाँ घास की रोटी खिलायी ।।

धन्य है वो पन्ना धाई, वन्दनीया नित्यप्रति।
देश की रक्षा को जिसने, अपने शिशु की वलि चढ़ाई ।।

नमन गुरुगोविंद को, दी जिन्होंने चार पुत्रों की शहादत।
चुन गये दीवार दो, अश्रु पूरित आंख
पर झुकने न पायी ।।

है अचम्भित जानकर "श्री" ऐसी पावन भूमि मेंं ।
पलते रहे जयचंद कैसे, शत्रु संग जिनकी सगाई ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल
प्राण मेंं मेरे समायी

ओ जगत के रचयिता, कृति न तेरी 
समझ आयी।
पर अप्रतिम रचना की छवि प्राण मेंं मेरे समायी ।।

चर अचर तूने रचे, सागर रचे, नदियां रचीं 
और मुखर या मौन भर दी, विविध रंग की रोशनायी ।।

भावना के खेल मेंं तूने गढ़ी, इक अज़ब सी चतुरता ।
प्रीति मेंं भय, विश्वास मेंं सन्देह भर, मिलन के संग दी जुदाई ।।

नभ में भरा विस्तार अपना, दी धरणि को धैर्यता ।
प्रकृति मेंं भर सहिष्णुता, इक विशद महिमा सजायी।।

है असम्भव समझना "श्री" किस तरह करता सृजन तू ।
ब्रम्हांड मेंं सबसे अलौकिक, दुरुह है तेरी खुदायी  ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल
ंं
स्वर मिला स्वर मेंं तुम्हारे

स्वर मिला स्वर में तुम्हारे, नहीं गाया जाएगा ।
आने वाला समय हम पर, उंगलिया उठाएगा ।

छल छिद्र से परिपूर्ण सारे दिख रहे निर्णय तुम्हारे ।
विश्वास ही जब उठ रहा, सौहाद्र क्या बच पायेगा ।।

पारस्परिक स्नेह और सम्मान ही, एकता का मूल है ।
जब हैं यही  दिल से नदारत, अपनत्व कब बन पायेगा 

जाति के सपने सुनहरे, छल रहे हैं मानविकता ।
जब लुप्त होगी मनुजता तो शेष क्या रह जायेगा ।।

आओ सपथ लें साथ मिल, बटने न देंगे जाति, भाषा धर्म पर "श्री"
इक्किस सदी का युवा अब पहिचान नव बनायेगा ।। 

श्रीप्रकाश शुक्ल

स्वर मिला स्वर में तुम्हारे

चाह थी इक स्वर मिला स्वर मेंं तुम्हारे गीत गाऊं ।
छेड नव तानें मधुरतम, इक नयी सरगम सजाऊं ।।
 
संकल्प था जो भी तुम्हारी चाहतेंं मुझसे रहींं ।
पूर्ण कर जैसींं अपेक्षित, चिर प्यार का वरदान पाऊं ।।

चाहत नहीं थी कभी भी, एक सपनों का महल हो ।
एक छोटा नीड़ चाहा, रूठो जहाँ तुम मैं मनाऊं ।।

संतुष्ट हूं शिकवा न कोई, पर जिन्दगी सार्थक बने जब ।
उदास चहरे पर किसी के खुशी की एक लहर लाऊं।।

घर घर में फैली असहिष्णुता, आज चिन्ता का विषय "श्री"
कौन सी संजीवनी ला  सोचता इसको मिटाऊं ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल

 
बूँद भर जल बन गया

आज नहीं कुछेक दशक से जल संकट छाया भारत में ।
एक बूंद भर जल बन गया जीवन दाता भारत में ।।

पृथ्वी पर जल का स्रोत कहाँ सोचा न समग्रता से हमने ।
नदी सरोवर सागर समझे, जो जल के धाता भारत में ।।

जल प्रदायिनी तो वर्षा है, भरती पृथ्वी का आँचल जो ।
धरती की कोख पड़ी सूखी, हुआ
अधिक दोहन भारत में ।।

नभ को स्नेह बड़ा धरती से यद्यपि दूरी, पर चाहत पूरी ।
प्यासी धरती की हर एक तपन को आकाश बुझाता भारत में ।।

तपती धरती बोली नभ से, प्रिय आओ, देह समा जाओ ।
नभ बोला मात्र देह ही क्यों देही भी तृप्त करो भारत में ।

मैं तो रहा प्रतिपल तत्पर करने को समर्पण पूर्ण रूप ।
पर भौतिकता के लालच में सम्पर्क बिगाड़े भारत में ।।

कुए नदी पाटे मानव ने बृक्षों को काट सपाट किया ।
अब कौन संदेशा प्रिये तुम्हारा,पंहुचाये हम तक भारत में ।।

अमृत सम जल का संरक्षण,संचय, हैं दोनों ही मूल्यवान ।
मितव्ययता से भोग करें, समभागी  बन बांटें भारत में ।।

 वातावरण संतुलन एवं वर्षा जल का संग्रह "श्री"
जल आपूर्ति दिशा में होंगे, अति उपयोगी भारत में ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल

बूँद भर जल बन गया 
 
बूँद बूँद भर जल बन गया, आज अनल से भी बढ़कर
निर्धन जनता को रुला रहा है, जन सम्पत्ति तहस नहस कर

जो प्रासादों में रहते हैं, उन पर चलता कोई जोर नहीं ।
जो पेट पालते सड़क किनारे, आश्रय उनके ले गया बहाकर ।।

नदियों से सांठ गांठ कर जल ने ऐसा निर्मम खेल रचा । 
रुद्र रूप ले टूटीं नदियाँ, कैसे कोई रख सके बचाकर ।।

त्राहि त्राहि हो रही असम में, मुम्बई भी छूटा नहीं अछूता ।
 उत्तर बिहार के संकट ने तो, रख दिये सभी के दिल दहलाकर  ।।

ये स्थिति नहीं मात्र इस सन की हर वर्ष यही हालत होती है ।
है जिनको हमने दायित्व दिया "श्री "वो छुप जाते हैं मुंह दुबकाकर ।।

श्रीप्रकाश शुक्ल