Thursday, 30 August 2018

आखों का पानी खोने का 

आखों का पानी खोने का, कारण कोई विशेष नहीं
मन की विकृत मानसिकता है, छूटा कोई देश नहीं 

नीरव निशीथ के अन्धकार में सत्ता को झांसा देकर 
चोरी कर भग जाते हैं, अन्तस में कोई ठेस नहीं 

सेवा का आश्वासन दे जन प्रतिनिधि तो बन जाते हैं 
पर कुमार्ग का पथ अपनाते होता दिल में क्लेश नहीं ।

आज धर्मसंकट दिखता है, सारा विश्व तमस में डूबा 
सत्य अहिंसा के मूल्यों का दिखता अब अवशेष नहीं ।
 
कठिन परिस्थितियां हों जब "श्री" संतुलन बनाना पडता है
 धैर्य, धर्म ही काबिज होते, सक्षम होता आवेश नहीं      

श्रीप्रकाश शुक्ल 
चिर तृप्ति अमरता पूर्ण प्रहर
 
भोगे जिस सत्ताधारी ने चिर तृप्ति अमरता पू्र्ण प्रहर
उसकी नाकामी ने ढाये, भोली जनता पर क्रूर कहर

रक्षा समाज के तन की हो या फिर हो अपने तन की 
यदि साफ सफाई नहीं हुयी तो तन पर जाती है धूल ठहर

तन का तप अति आवश्यक है अच्छी सेहत रखने को
अय्याशी तन को खाती है जैसे खाता है मंंद जहर

जीवन मेंं कठिन परिश्रम ही आगे बढने की सीढी है 
यदि संकल्पित हो जुटे रहे तो आयेगी नव एक लहर 

नैसर्गिक चाह इन्द्रियों की होती है सुख पूर्ण चलन
मेहनत इसमेंं गरिमा भरती "श्री," साथ चले यदि ईश महर

श्रीप्रकाश शुक्ल

तुमने स्वर दे दिया

तुमने स्वर दे दिया आज मैं निसंकोच खुलकर गाता हूं।
जितना ही लोग बहकते सच सुन, उतना ही   हरषाता हूँ ।।

दबी हुयी वाणी को लेकर युग युग तक रहा अपरिचित,
 ये तो विधिना का विधान था, ऐसा ग्रन्थों में पाता हूँ ।

जब समझा नियति नहीं कुछ, मिथ्या एक छलावा है।
 उठा, मगर लोगों ने रोका कह, अहंकार दिखलाता हूँ

बह निकला पानी सिर ऊपर जब, अंतस ने हुंकार भरी,
क्यों कायर बन करूं उठक बैठक, क्योंकर शौर्य लजाता हूँ ।

बस क्या था मार्ग प्रशस्त हुआ "श्री" छट गया तमश धीरे धीरे 
किस तरह आंकलन करती  दुनियां, अब साफ साफ सुन पाता हूँ ।


श्रीप्रकाश शुक्ल
काली सूरत धब्बे वाली

प्यारी सी मां, काली सूरत धब्बे वाली ओढ़ चुनरिया चली कहाँ 
राह जोहते, कब से बैठे, बांंध टक टकी , तेरे सारे भक्त यहाँ 

जब तू आती, खुशियां लाती, चंचल मन  बन एक पखेरू उड़जाता 
अंतस हर्षाता, रूह पा जाती, जग की सब से शीतल मधुर ठहाँ 

 दुष्ट संहारे, भक्त उबारे  कितने ही तू ने निष्काम भाव से 
जो पापों मे फंसा,  दग्ध  हो रोया, पा गया शांति तेरे कदमों की छहाँ 

सिंहवाहिनी, शक्तिशालिनी, कष्टहारिणी भव भय भंजनि तू है 
धरती पावन होती,धान्य उगाती,पग रज पड जाये तेरी जहाँ ।

नवरूपों वाली, बहुफल दायी, तन मन धन सुख दायी है तू "श्री " 
भक्त तेरे, निष्कपट भाव से, जहाँ बुलाते, जाती है तू पहुंच वहाँ ।

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Wednesday, 29 August 2018

मैंने तो बस इतना 

मैने तो बस इतना ही कह तुमको आगाह किया है
ख्याल पूर्णत अव्यवहारिक है जो तूने वरण किया है

तुमने सोचा प्रथ्वी पर इक ऐसी मू्र्ति सजाकर रख दूं
प्रेम सहित जीवन यापन का जिसने संकल्प लिया है 

पर पैदा कर स्वच्छंद छोडना बिल्कुल पर्याप्त नहीं है 
बहुधा कुमार्गगामी  लोगों ने सबका अहित किया है

अगर आप भू तल पर होते तो फिर ठीक.समझ पाते  
किस तरह विविध जिल्लत का जीवन लोगों ने यहां जिया है 

हमने यहाँ सर्वसम्मति से अब निर्णय ये कठिन लिया है 
अपना पथ खोजेंगे खुद "श्री" मान्य नहीं तुमने जो हमें दिया है ।

श्रीप्रकाश शुक्ल
मैंने तो बस इतना 

बैठे हुए क्षीर सागर में, सृष्टि संचालन करते हो
धारणा यही समदृष्टि से सबका पालन करते हो 

पर जो देखे तौर तरीके, तो उल्टा ही पाया है
दुर्जन खाते दूध बतासा, सज्जन मन दुख से भरते हो

जब खुल्लमखुल्ला दिखी हंसाई, मैंने तो बस इतना बोला 
क्यों नहीं ठीक करते विधान, क्या दुष्टों से डरते हो 

उनकी भृकुटि तनी, बात बिगडी, कब मैं चुप रहने वाला था 
नहींं मानता ठकुराई मैं, क्यों बिन बात झकडते हो 

बिल्कुल साफ कहे देता हूं बुद्धिबल जिस पर तुम्हें गर्व है
मैं भी सक्षम "श्री" रच सकता हूं सृष्टि जैसी तुम रचते हो

श्रीप्रकाश शुक्ल






मैं इस मंजिल पर

मैं इस मंजिल पर पहुंचा हूँ क्यूँकि साहिल आप रहे।
परिवार की खातिर आप सदा कर्तव्यों पर डटे रहे ।।

कुछ छोटी सी आकाक्षायें लेकर हम तुम साथ चले थे
पर देख समय की धार तुम्हारे मन मेंं नये विचार बहे

मैंने सोचा जितनी चादर उतने ही पैर बढाना है 
पर तुमने डोर संभाली बढ, स्वेच्छा से कुछ बिना कहे

मुझे याद वो पहला दिन, जब तुम स्कूल गयी थी 
बेटी ने पूछा, माँ है कहांं, मैं चुप था, बस अश्रु बहे 

आज सभी बच्चे कहते हैं, पापा "श्री" माँ अदभूत है 
माँ ने समिधा बन जीवन मेंं परिवार यज्ञ के कष्ट सहे 

श्रीप्रकाश शुक्ल