Wednesday, 29 August 2018

मैं इस मंजिल पर 

मैं इस मंजिल पर 
 पूर्ण तृप्त हूं ।

मां का बुना पहनकर स्वेटर 
लाद पीठ पर ज्ञान का बस्ता
अचार परांठा साथ बांधकर
मीलों चला वो दुर्गम रस्ता
वाह, गुरू जी का क्या कहना
द्रोण सरीखे पूज्यमना
मैं ऐसे वचपन से
पूर्ण तृप्त हूं

काँँलेज मेंं प्रवेश पाकर
छात्रबृत्ति पर निर्भर रहकर
विज्ञान गणित पर जोर लगाकर
मानक सहज नवीन बनाकर
भौतिकी प्रवक्ता बनकर आया
जितना सीखा सभी पढाया
मैं ऐसी सीढी पर चढ़
पूर्ण तृप्त हूँ 

आगे पड़ा देश पर संकट
घर घुस आये चीनी मर्कट
हमने चुनी भारतीय सेना
मीठे थे वो चने चवेना
नापाक पाक से दो दो हाथ
नश्वर जीवन हुआ सनाथ
मैं इन निर्णायक निमिषों से  
पूर्ण तृप्त हूं ।

अब तो उम्र ढल रही है 
नैया ठीक चल रही है 
सन्तति ने निज फर्ज निभाया
जो मैंने चाहा, कर दिखलाया
सन्तोष और संवेदन है अब
आभार और आराधन है अब
मैं इस मंजिल पर जहाँ खड़ा हूँ
सम्पूर्ण तृप्त हूँ ।

श्रीप्रकाश शुक्ल
आज का दिन

लुप्त हुआ दिन जो अतीत मेंं, उस से क्या लेना देना
उसकी सुधि तो बतलाती है, बीता कैसे दिन कैसे रैना
जिस पल पर अधिकार अभी है, जिससे परिवर्तन आ सकता है
वो पल है बस मात्र अभी का, उसे तराशा जा सकता है 

जीवन का उद्देश्य एक है, शान्त और सुखमय जीवन
इसे सुरक्षित कर सकते हैं, यदि हम गढें आज का दिन
भ्रामकता अतीत, आगत की मिथ्या है, निरस्त कर दो 
वर्तमान पल को संभाल कर, साधन और ऊर्जा भर दो

मन स्थिति जो भी इस पल की, पहचानो स्वीकार करो
जो प्रतिरोधक भाव उठ रहे ,उन्हें नकारो उर न धरो
जो कुछ करना है अभी करो, सबसे उत्तम आज का दिन है 
मन मेंं शीघ्र भाव उपजेगा, सब सम्भव कुछ नहीं कठिन है 

होती जाती शाम 

प्रकृति पुरुष दोनोँ का जग में, है निर्धारित आयाम 
उदभव से समय बीतता जाता, होती जाती शाम

पुरुष बुद्धि से युक्त, सोच और सृजन शक्ति का धारक है 
जीवन जिससे मधुमास बने, वो चुन सकता है 
काम 

जहाँ गुलाब की पंखुरियाँ हों, कांटों का होना निश्चित है 
कैसे कांटे बचा सुमन चुन ले कोई, है बुद्धिमता का नाम

कुछ कर्मठी लोग बिन मन्थन, तुरत काम मेंं जुट जाते हैं 
यदि योजना बद्ध बढेंं आगे, तो निश्चित पायेंं वांछित परिणाम

मन स्थिर और शान्त चाहिए तो बस केवल एक राह है 
किसी घाव पर पाहा रख "श्री", टूटे मन को लो थाम



श्रीप्रकाश शुक्ल
वही बीता हुआ पल 

चैन से सोने न देता बस वही बीता हुआ कल 
उलझनें वो ही सुझाता था न कोई जिनका  हल 

जिंदगी थी राह पर, पर उलझनें कुछ पाल लीं 
शूल सी चुभतीं रहीं, पर जिन्हें था छोडना मुश्किल 

आज कितने वर्ष बीते पर न कल ने साथ छोड़ा 
अश्रु जल से सिक्त कर, हर ख़ुशी करता विफल   

औचित्य क्या डूबे हुए हम, आज भी बीते क्षणों में 
क्यों न गुजरे कल को भूलें और करें अगला सफल 

बुद्धि का संबल लिये  विगत को जो भूलता "श्री"  
वो मनीषी स्वयं और सारा जगत करता विमल 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
 
 
जब जब नीड़ बनाये हमनेंं

जब जब नीड़ बनाये हमनेंं, पास बसे पंछी 
मुस्काये ।
बोले, मोह जाल मेंं फस क्यों  फिरते हो भरमाये  ।

कोई पखेरू इस युग मेंं, जिसको मिट्टी से प्यार नहीं है ।
नहीं टिकेगा इन नीड़ों मेंं चाहे कोई लाख मनाये।

लुप्त हुये वो दिन अतीत के, मातृभूमि ही जब 
कवि मेंंदीरत्ता  का शुभ आगमन 

खनकाने लग पड़ी दिशाएँ अपनी रतनजड़ित पायलियांं,
बैरानक्रीक  की पावन लहरों से हुये अनेकों मंत्र उच्चरित 
काले पहाड़ के शिखरों से लौटी गूंज यज्ञ शंखो के स्वर ले ,
अभिनंदित हैं सभी, हुुये कवि  मेंंदीरत्ता आज अवतरित
मधु, रेनु हैं परम अनुुग्रहित, पाकर ऐसा उपहार ईश से 
जगदीश उमा आनन्दित हो भरते कवि की झोली अशीष से 
मीरा सोच रही विस्मित हो ,भाई प्यारा पाकर गुड्डे सा
रक्षावन्धन के अवसर पर, लाया कौन खिलौना ऐसा

कनिका की आखों में चमकी हैं ,अनगिन हीरक कनियां
रोहित को दायां हाथ मिला है ,एक अनूठे नए रूप में
यही कामना है हम सब की, रहे पूर्णिमा, घिरी निशा में 
और दिवस जीवन के पथ के रहेंं चमकते खिली धूप में

शुभ कामनाओं सहित 
 गीता -श्रीप्रकाश 
एवं समस्त परिवार

Shriprakash Shukla wgcdrsps@gmail.

सब कुछ थी
अब तो ऐशो आराम की दुनियां हर पंछी का जी ललचाये 

इस भ्रमित मानसिकता का कारण अपनी  शिक्षा पद्धति ही है 
जिसमें विदेश के सुख साधन के हमने बढ़ चढ़ स्वप्न दिखाये 

है नितांत आवश्यक अब, हम समाज मेंं जाग्रति लायेंं
ऐसी प्रारम्भिक शिक्षा  दें, जो देश प्रेम की अलख जगाये।

जिस उपबन मेंं जन्म लिया और जहाँ चुगे 
खाने के दाने
वो शिक्षा जो इस उपबन के संरक्षण की सपथ दिलाये ।

अपना पेट पालने को तो सक्षम है हर अदना सा प्राणी
पर हमें चाहिए ऐसी शिक्षा जो पर हित का पाठ पढ़ाये 

एक बार यदि सफल हुये हम देश भक्ति उपजाने मेंं
तो स्वर्ण महल बन जायेंंगे "श्री" जो भी हमने नीड़ बनाये ।

श्रीप्रकाश शुक्ल



जब जब नीड़ बनाये हमनेंं

जब जब नीड़ बनाये हमनेंं, पास बसे पंछी 
मुस्काये ।
बोले, मोह जाल मेंं फस क्यों  फिरते हो भरमाये  ।

कोई पखेरू इस युग मेंं, जिसको मिट्टी से प्यार नहीं है ।
नहीं टिकेगा इन नीड़ों मेंं चाहे कोई लाख मनाये।

लुप्त हुये वो दिन अतीत के, मातृभूमि ही जब 
सब कुछ थी
अब तो ऐशो आराम की दुनियां हर पंछी का जी ललचाये 

इस भ्रमित मानसिकता का कारण अपनी  शिक्षा पद्धति ही है 
जिसमें विदेश के सुख साधन के हमने बढ़ चढ़ स्वप्न दिखाये 

है नितांत आवश्यक अब, हम समाज मेंं जाग्रति लायेंं
ऐसी प्रारम्भिक शिक्षा  दें, जो देश प्रेम की अलख जगाये।

जिस उपबन मेंं जन्म लिया और जहाँ चुगे 
खाने के दाने
वो शिक्षा जो इस उपबन के संरक्षण की सपथ दिलाये ।

अपना पेट पालने को तो सक्षम है हर अदना सा प्राणी
पर हमें चाहिए ऐसी शिक्षा जो पर हित का पाठ पढ़ाये 

एक बार यदि सफल हुये हम देश भक्ति उपजाने मेंं
तो स्वर्ण महल बन जायेंंगे "श्री" जो भी हमने नीड़ बनाये ।

श्रीप्रकाश शुक्ल



खिली धूप की चादर

बर्फीले पहाड पर फैली, खिली धूप की चादर 
लगता जैसे सिहर रहा हो भरा दूध का सागर

वर्षा आई कुछ दिन ठहरी साथ निभाकर चली गयी । 
अब गुजरे एहसास रुलाते बार बार सुधियों में आकर

कोहरा ओढे ठिठुर रहे हैं, ठूंठ हुये तरुवर सारे 
मानो ऋषि मुनि मूक खडे हैं इष्टदेव का ध्यान लगाकर 

यद्यपि तापमान बाहर का मन में उदासी भरता है 
पर दिनकर की उष्ण रस्मियां हर्षित करतीं छितराकर 

हिम बरसे चाहे कितना भी, या फिर झंझाबात दुसह हों
पर अमरीका के वासी करते "श्री" अपना सारा काम बराबर 

श्रीप्रकाश शुक्ल