Monday, 5 February 2018

प्यार के रंग में 

जिंदगी में शांतता का प्यार ही आधार है 
प्यार बिन संसार में हर भाव ही निस्सार है 

प्यार के रंग में जो डूबा भूलकर शिकवे सभी  
फूल है उस चमन का जिसमें सदा बहार है 

अभिव्यक्ति में यदि हो समाहित सभ्यता शालीनता,
स्वच्छंदता से बोलने का सभी को अधिकार है 

रोक पाया जो न आंसू देखकर आँखें सजल 
जिंदगी का हर निमिष उसके लिए उपहार है 

विद्वता अधिकांशतया दर्प को "श्री" जन्म देती 
पनपने से पहले कुचलना विद्वता का सार है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
जीवन के पतझड़ में 

जीवन के पतझड़ में अतीत के कोमल पल सुधि में आते हैं 
नयनवारि खुशियों के तत्क्षण, आँखों से  टूट लुढ़क जाते हैं 

कल्पना विवशता मय जीवन की  तन्हाई सूनापन भरती है   
धुंधले चित्र विगत के सन्मुख आ अधबुझी राख धधका जाते हैं 

मौषम के पतझड़ में  तो केवल, तन का आवरण बदलता है 
पर शनै शनै नव किसलय उग हर तरु को पुनः सजाते हैं 

पतझड़ भी इक अहम चरण है मानव जीवन के मौषम का  
जहाँ शक्तियाँ,साथी, रिश्ते, पीले पत्ते सम मुरझा जाते हैं

एक यही माकूल सुअवसर  चिंतन और मनन करने का , 
जीवन की गति विधियों का जब सही आंकलन कर पाते हैं ।

ऊहापोह भरे जीवन में, हमने दुःख सुख सब से बांटा "श्री "
अब जब शाश्वत सत्य सामने, क्यों सार्थक शिष्ट न जी पाते हैं 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
उड़ान में विघ्न नडालो 

आज देश परवाज़ भर रहा इसकी उड़ान में विघ्न न डालो 
औचित्य यही इस पुण्य यज्ञ में कर्माहुति दे अगत संभालो

जब एक बार बन गया हौसला ऊंची उड़ान भर लेने का 
तो देख रहे क्या आसमान, डैने खोलो दमख़म अजमालो
 
आज मनीष गणों का जमघट जनमेजय यज्ञ कर रहा है 
काले व्यालो बच न सकोगे चाहे खुद को कहीं छुपालो 

पिछले सात दसक में कितने अपने हमको लूट ले गए
उठ विवेक से नीर क्षीर कर, प्रजातंत्र की लाज बचा लो 

व्यक्ति खड़ा जो पंक्ति अंत में आकुल निगाह से देख रहा है 
आशाये उसकी ध्वस्त न हों बढ़कर ढांढस दो गले लगा लो 

एक अकेले के साहस की, अपनी सीमा होती है "श्री"
इससे पहले थक जाए वो अवरोधक गांठे मिल सुलझालो  

श्रीप्रकाश शुक्ल 
प्रश्न छेड़े ही नहीं

अविश्वस्त पड़ोसी की हरकत का नहीं सही संज्ञान लिया  
 कठिन प्रश्न छेड़े ही नहीं, जो कहा, उसे बस मान लिया  

 कितने सारे प्रयत्न कर छोड़े, किसी तरह भी बात बने 
 पर वैमनश्यता इतनी गहरी छुप छल को अंजाम दिया 

 दोनों ही पडोसी खूब जानते, हित मिलकर रहने में है 
 कारण रहा कौन सा जो  लड़ झगड़ अभी तक साथ जिया  

क्या रीति नीति हो ऐसी जिससे, सद्भाव प्यार आपस में हो 
क्या भूल रह गयी उसमें अब तक जो हमने व्यवहार किया 

है जो  सुंदर भविष्य की चाहत ,तो शाश्वत सत्य यही है "श्री" 
मिला उसे जिस देश जाति ने, शठता सँकरापन त्याग दिया 

श्रीप्रकाश शुक्ल

Wednesday, 18 January 2017


शिवम् सुन्दरम् गाती है 

देश मेरा भारत ऐसा जहाँ परतीति निभाई जाती है 
प्रकृति सहचरी बन पुरुषों के जीवन में रस लाती है 

यहाँ विचारों की स्वतंत्रता मूलभूत अधिकार मिली है   
लड़ना भिड़ना बहस परस्पर समायोजना कहलाती है  

ऋतुएँ अनेक, त्यौहार अनेकों, रास रंग के ढंग विपुल, 
प्रकृति कांति से हुलसित वाणी 
 शिवम् सुंदरम गाती है  

मासों में मधुमास अकेला अनुराग मिलन के रंग भरे 
भरता मधुर विरह पीड़ा जो सहज ह्रदय उग आती है 

शिशिर गयी, पतझड़ बीता, तरु किसलय जब लाते "श्री"
फूली सरसों देख, कृषक जन मन में मस्ती छाती है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 



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