Wednesday, 4 January 2017

सूर्य नूतन वर्ष का

अधीरता से है प्रतीक्षित सूर्य नूतन वर्ष का 
विगत के जो शूल मेंटे, आधार हो नव हर्ष का 

वीर कितने देश के अब तक शहादत दे चुके 
दिखता नहीं औचित्य ऐसे बेसबब संघर्ष का

नीतियां तो सुघढ़ थी पर क्रियान्वन लड़खड़ाया  
कूद बैठे सोचे बिना अंजाम क्या निष्कर्ष का 

अब गरीबों को सिखाते वचन देकर मुकर जाओ 
क्या यही है सत्य पथ जीवनोउत्कर्ष का  ?

आश्चर्य है "श्री"इस तरह की स्वामिभक्ति मिल सकी
ये छल कपट परिपूर्ण मत निर्णय समूचे विमर्श का 


श्रीप्रकाश शुक्ल 
विमुद्रीकरण  एवं  विपक्ष 

अब नहीं स्वीकार यह तुम हर कदम पर विध्न डालो 
साफ सुथरी नीतियों पर स्वार्थ हित कालिख उछालो 

अब तलक हमने सहे गर्हित कथन शिशुपाल जैसे   
रक्षित रहोगे अगत में, ऐसी न मन में भ्रान्ति पालो 
 
ओढ़ कर नकली मुखौटे आज तक जनगण छला 
सारे पत्ते खुल गए, अब संभव नहीं इज्जत बचालो

माँ लक्ष्मी का रूप जो, "चूरन की पुड़िया "कह रहे 
आनदं जो कल्याण चाहो ऐसी सम्मति मन से टालो  
 
लघु पेशावर, आम जनता तक यही सन्देश मेरा
बैंक में  रख दो  बचत, लाज़िम नहीं नाहक छुपालो

घर में रखी "श्री "आपकी श्री बेशक ही है गाढ़ी कमाई
आधुनिक युग में रहो,  निश्चिन्तिता से घर संभालो

श्रीप्रकाश शुक्ल

बादलों की कूंचियों पर

बादलों की कूंचियों पर इलज़ाम, लगाया न करो 
कुछ ख़्वाब नभ से झर भी जाँय, घबराया न करो 

मज़हब के मामलातों में दखलंदाज़ी  ठीक नहीं 
मसला हलाला का हो गर, चुप रह जाया न करो 

होश अपना खो न बैठे कहीं, दीप की ये वर्तिका 
होठों को इतने पास ला, लौ को बुझाया न करो  

मंजिल तक पहुँचने में अवरोधक अनेक आते हैं 
राहें अपने ही उलझा दें गर, तिलमिलाया न करो 

हारा हुआ देश या इंसान खुद ही शर्मसार होता है 
बार बार  सुना के "श्री" एहसास बढ़ाया न करो 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
बादलों की कूचिओं पर 

बादलों की कूचिओं पर जाएँ झर यदि कुछ सितारे 
दोष मत देना नियति को, कर्म को रखना सँवारे 

स्वार्थ तजकर देश हित जब कदम कोई उठेगा 
शैलाब जनता का बहेगा साथ में तज कर किनारे 

जाति केआधार पर जो प्राथमिकता  बट रही है 
लगती नहीं वो न्याय संगत पिस रहे अनगिन बिचारे 

नीतियां सारे जगत की आज उलझी दिख रहीं हैं 
सच औरअहिंसा के समर्थक आज दिखते थके हारे 

देश अपना धैर्य धारे प्रगति पथ पर बढ़ रहा है  
ये तो अभी शुरुआत है "श्री" काम बाकी ढेर सारे 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Wednesday, 9 November 2016

प्राण दीप मेरा जलता है 

अंधकार के बादल जग में आज गहनतम घिरे हुए हैं 
सारी जगती पर कहर देख भय से प्राणी डरे हुए हैं  
दिखता नहीं कन्हैया कोई जो गीता संचार कर सके    
दुर्बल प्राणों की नस-नस में चिंगारी जो आज भर सके 

हैरत में हूँ, निर्दोष मार करआतंकी को क्या मिलता है 
ऐसी जघन्य घटनाएं सुनकर प्राण दीप मेरा जलता है 
सभी विज्ञ, ऐसे कुकृत्य का जग हित में कोई अर्थ नहीं 
चाहें तो इसे रोक सकते हैं इतने भी  तो असमर्थ नहीं  

आज मनुजता पीड़ित है आसुरी वृत्तियाँ प्रखर हो रहीं 
शिष्ट संस्कारों केअभाव में कोमल तत्वअबाध खो रहीं 
आवश्यक है शैशव से ही ऐसी शिक्षा अनवरत मिले 
साथ साथ मिल रहने की भावना सदा ही ह्रदय पले 

श्रीप्रकाश शुक्ल  
अंधकार के क्षण जल जाते 
भौतिकता के बढ़ते प्रभाव में 
कोमल तत्व विलीन हो रहे ।                            
हम खुद ही अपनी राहों में 
कंकड़ पत्थर के बीज बो रहे ॥ 
दुःख अप्रियता और विरोध के 
लगा रहे हम बृक्ष कटीले । 
गहरी खायी खोद रखी है 
उगा रखे तंगदस्ती टीले ॥ 
मानवता को भूल आज 
दे रहे साथ जो अनाचार का । 
बुद्धिहीन असहाय सरल  हैं 
बोझा लादे कुत्सित विचार का ॥  
मानवता से विरत व्यक्ति 
कल्याण मार्ग क्या चल पाएगा ।  
क्षमा,सत्यता ,धीरज तजकर 
पशु समान ही रह जाएगा ॥ 
जो हम तिमिराच्छादित अंतस में
 स्नेह शांति के दीप जलाते । 
जीवन आँगन प्रकाशमय होता,
 अंधकार के क्षण जल जाते ॥ 

श्रीप्रकाश शुक्ल 

  
कभी चल दिए साथ 

कभी चल दिए साथ सत्य के, अडिग रहे अपने वचनों पर 
भारत भू की मिटटी के  तरुवर, कण कण  टूटे झुके न पर 
देख चूका हूँ सारी दुनियाँ, और पढ़े इतिहास सभी 
भारत  जैसे धर्म समर्थक, दिखे न हमको कहीं कभी 

हरिश्चन्द्र, बलि की गाथाएं, राधेय, पितामह के वो प्रण 
वचन बद्धता के संरक्षण में, करते रहे सभी कुछ अर्पण
परिपाटी हम वही निभाते चले आरहे हैं इस युग में 
उनको देते नदियों का पानी जो दहशत फैलाते मेरे घर में 

हमने संकल्प लिया जग हित का निंदनीय कुछ भी न करेगे 
पर विषदंतक के दांत खींच उसको अवश्य विषहीन करेंगे 
कैसी बिडम्बना है, इस युग में सभी स्वार्थ में इतने रत हैं 
मुंह ढककर सोये है यदयपि ,भावी विनाश से अवगत हैं 

 
श्रीप्रकाश शुक्ल