Sunday, 13 April 2014

जीवन के ढाई आखर को

     जिसने पढ़ा लिखा समझा जीवन के ढाई आखर को 
  जिसने बांटा दर्द, किया साझा औरों की शंका,डर को 
  जिसके भर आये नयन  देख गीली  आँखें औरों की 
  जिसको कसकी पीर हमेशा  अपनी सी ही गैरों की  
  
  जिसने बढ़ती हुयी घृणा को आड़े हाथ लिया है 
  जिसने कोमल भावों का बढ़ चढ़कर साथ दिया है 
  सच पूछो तो उसने ही जीवन का मरम जिया है 
  उसने ही जीवन घट में अमृत रस पान किया है 

   वो मनुज नहीं है देव तुल्य है या कोई अवतारी है 
   औरों के दुःख को जीना उसकी अपनी लाचारी है 
   वो आता है इस जग में केवल एक मसीहा बनकर    
   और लौट जाता है, जग को सन्देश प्रणव का देकर  

श्रीप्रकाश शुक्ल 

जीवन के ढाई आखर को

जीवन के ढाई आखर को जीवन में आज उतरने दें  
दुर्भावों की दावानल को दें बुझा न और पनपने दें  
ये आखर तो युग युग से रहे सनातन अजर अमर हैं 
भाषा कोई भी रहे मगर अनुभूति, बोध, इक  स्वर हैं  

इन शब्दों में रहा समाया विश्वास भरोसा और समर्पण 
बंधन सब ही नश्वर होते जब खींच बाँध लेता आकर्षण 
धीरे धीरे सहृदयी सोच बदल जाती अशरीरी एहसासों में   
भाव पराये अपने का फिर नहीं समाता उच्छ्वासों में 

ये प्रेम पगे ढाई अक्षर जो आत्मसात कर अपनाता है 
वो जाति धर्म रंग के विभेद को बिन प्रयास झुठलाता है 
आवश्यक है आज जगत में हम सब ऐसा परिवेश बनायें  
समरसता की पैनी किरणों से कटुता के बादल छटते जायें   

श्रीप्रकाश शुक्ल 
रचे तोरण और बन्दनवार तेरे आगमन को

रचे तोरण और बन्दनवार तेरे आगमन को 
बैठे रहे पलकें बिछाये पथ तुम्हारे हम प्रतीक्षित 
तुम न आये लौटकर मोहन मदन,मेरे सखे 
कैसे बताएं किस तरह हम जी रहीं सखियाँ दुखित   

अश्रुओं की धार जब से तुम गये टूटी नहीं हैं 
याद पल भर भी तुम्हारी ह्रदय से छूटी नहीं है  
सूना पड़ा वो यमुन तट ग्वाल सब बेचैन हैं 
झलक पाने को तेरी निश दिन तड़पते नैन हैं 

आज उद्धव जी पधारे ज्ञान दें निर्लिप्तता का 
हम अनंगी प्रेम प्यासे क्या करें उस विद्वता का 
जिसको सुनकर पीर मन की तनिक भी घटती नहीं
मूर्ति जो दिल में गढ़ी तिल मात्र भी हटती नहीं   

आप हमको भूल जाएँ पर न सकते भूल हम 
दूरियां कितनी बढ़ें अनुरक्ति पर होती न कम 
हम पथिक हैं प्रेम पथ के प्रेम ही बस सार है 
जो न प्रिय के साथ हों तो जिंदगी निस्सार है  


श्रीप्रकाश शुक्ल
जो जीवन में जगा कौन उससे बढ़कर है 

जो जीवन में जगा, कौन उससे बढ़कर है 
संघर्षों से भगा, नहीं कोई उससे घटकर है 

कितनी भी विपदायें आयीं जिसने हार न मानी 
अपनी पीड़ा सम ही जिसने सब की पीड़ा जानी 
दर्द पराये  लेने को जो रहा हमेशा तत्पर है 
वो ही  जीवन जिया वही सब से  बढ़कर है 

जीवन की  सर्दी गर्मी में जो सम भाव रहा
कोई फेंके खींच या ठोंके पीठ न कोई परवा
लक्ष्य सदा ही रहा वही जो सब को हितकर है 
जो जीवन में जगा कौन उससे बढ़कर है 

लोलुपता का पाठ  कभी ना जिसने सीखा 
सद्पथ में स्वाद थपेड़ों का लगा कभी ना तीखा  
संघर्षों के बीच रहा जो  खड़ा सदा डटकर है 
ऐसा कर्मठ इंसान जगत में सब से हटकर है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
मंगल गान : स्वर्णिम सालगिरह अरोरा  दम्पति 

श्री जयराज और निर्मल दम्पति का, आज मधुर स्वर्णिम आबंधन 
मन मयूर नाचत आनंदित, थिरक थिरक करता अभिनंदन 
हँसते  हँसते समय विताया,  जीवन में कोई शिकवा न गिला 
जब बगिया के फूल महकते हो, ऐसा क्यों तब होता न भला 

अब यही कामना करते हैं जीवन की बगिया हरी रहे 
पग पग पर आ खुशियां बिखरें ये जोड़ी यूं ही सजी रहे 
महफूज़ रहें जीवन के पल दुनिया की सभी बलाओं से 
दोनों का साथ रहे सज्जित शशिधर की विविध कलाओं से 

आज हम सभी भावी जीवन की यही मनौती मना रहे                        
जोड़ी रहे सातवें नभ पर प्यार अपरिमित बना रहे 
जीवन की बगिया में, निश दिन ही आये नव बहार 
साथ स्वजन परिजन का, रहे लुटाता अतुलिट प्यार  

मंगल कामनाओं सहित 

शुक्ल परिवार 

कुछ भीगी तानें होली की 

ध्रुपद धमार ठुमरी में लिपटीं,कुछ भीगी तानें होली की  
गूँज रही फागुन में चहुँ दिश याद दिलाती हमजोली की  
ओढ़ चुनरिया  पीले रंग की सरसों झूल रही मुस्काती  
बिछड़े साथी की सुधि मन में, बादल सी मडरा जाती  

फागुन में हुरआये फगुआ, ढूंढ  रहे घर द्वार गली 
कोई कहीं ना छूटे ऐसा  जिसके घर होली न जली 
होली त्यौहार प्रेम रस रंग का हर्षोल्लास उमंगों का  
गलबाहें डाल मनायें इसको, नाम मिटा दें दंगों का 

अपना ही ऐसा देश जहाँ मद मस्ती के त्यौहार अनेक 
सभी भुलाते रंजिश शिकवे  दिल में भर आता विवेक 
प्रकृति थिरक उठती उन्मादित, कण कण उठता झूम 
नर नारी आमोद मनाते चहुँ दिश दिखे अपरिमित धूम 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
कुछ भीगी तानें होली की 

मद मस्ती भर जातीं  हैं  कुछ भीगी तानें होली की
सहसा सुधि में आतीं हैं  बातें मधु भरी ठिठोली की                                       

होली में हुरआये फगुआ  घूमा करते हैं  गली गली 
क्या रंग विरंगे चहरे हैं क्या चाल गज़ब है टोली की 

मन में सद्भाव अपरमित है  प्रेम बांटता है  हर कोई
भरत सरीखा मिलन रहा क्या उपमा दें हमजोली की    

हँसते गाते मौज मनाते रंग गुलाल गालों पर मलते 
झर रहा प्यार चहरे से जब किस को परवा बोली की 

जब भी नहीं भाग ले पाता होली के हुड़दंगों में  "श्री "  
दिल में भर आतीं है यादें फागुन की सजी रंगोली की 

श्रीप्रकाश शुक्ल