Thursday, 6 March 2014

कौन मन के दर्पण में

देह आत्मा के बंधन को त्रिगुण सदा संचालित करते   
गुणानुसार मानवीय प्रकृति में खट्टे मीठे रस भरते 
किसी तरह चलती थी नौका धीरे से हिचकोले लेती    
जीवन के नियत पड़ावों को छूती रूकती संबल देती    

अरे कौन मन के दर्पण में सहसा आज हुआ प्रतिबिंबित  
अनुभूति प्रेम की सहज उठी अंतस हो उठा स्वयं दीपित  
करुणा के अंकुर फूट पड़े, पर सेवा भाव हुआ  विकसित 
हृद  सागर शांत प्रशांत हुआ, लहर ज्ञान की उद्वेलित 

ये कृपा दृष्टि है प्रभु की, या फिर  निखरे पुण्य विगत के 
या रज, तम  को कर निरस्त, सत गुण हावी हुए उछलके  
जो भी हो आराद्ध्य हमारे आज मेरे मन मंदिर में स्थित 
जिनको बिन देखे रहे विकल और राह जोहते हुए व्यथित

श्रीप्रकाश शुक्ल 
कौन मन के दर्पण में


अरे कौन मन के दर्पण में, बार बार टुक टुक करता है 
सुधियों की चोंचों से चोटिल, मन में आ पीड़ा भरता है 
क्रूर नियति के हाथों में, क्यों नहीं समर्पण करता है 
अनबुझी मिलन की चाह लिए,जाने क्या ढूँढा करता है 

दुनियाँ स्वप्नों सी टूट गयी थी, जब पंछी पथ छोड़ चला 
अश्रु भरे दृग रोक न पाये, फिर कौन रोकता  उसे भला 
सोचा था समय संभालेगा, कालान्तर विगत भुलायेगा 
मौसम कैसा भी रहे मगर, अब पंछी लौट नहीं आयेगा  

पर पहली वर्षा की सौंधी सुबास, आसान न होती बिसराना  
पहली छुवन पांच पोरों की, सम्भव नहीं सहज मिट पाना 
कितना भी गहरा संयम हो, वो दर्पण सुधियों में आता है 
जहाँ धरा हो चित्र स्वयं का, पंछी मन वहाँ दौड़ जाता है  

श्रीप्रकाश शुक्ल 

Tuesday, 31 December 2013

रूप अपना देखा करती है

नर नारी के प्रणय पाश में रही युगों से रीति यही  
एकाधिकार की चाहत हर नारी मन में रहती है 
नर भी यदि संयम साध निभा पाये जो नारी वृत 
तो फिर जीवन नदिया कल कल स्वर भर बहती है 

गोपियाँ जभी यमुना सरि पर जल भरने जातीं, 
राधा नित तट पर बैठ रूप अपना देखा करती है 
सोचा करती है जब मैं इतनी रूपवान हूँ सुंदर हूँ 
क्यों कान्हां की दृष्टि मेरी सखियों पर पड़ती है  

राधा को चिंतित देख स्वयं कान्हां ने कहा सुनो राधे,
ऐसा संशय व्यर्थ पाल क्यों मन में दुःख भरती हो  
हम सब से, सब हमसे, रखते अनुराग एक सा ही 
एक तुम्ही हो, जाने क्यों स्नेह अपरिमित करती हो 

हम आये हैं इस धरती पर ये भी पाठ सिखाने जग को 
प्रेम,  कामना रहित रहे  यदि, खूब  फूलता फलता है  
जीवन अभिरम्य रंगशाला बन नाना रूप अंक भर लेता 
अनुरक्ति कलित पथ पर, जीवन रथ सज कर चलता है 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
रूप अपना देखा करती है

    बेटी सर्वोत्तम कृति विधि की कारुण्य,दया,ममता धारे 
  मूर्ति प्रेम की, ढ़ेरी साहस की, रूप अनेकों सहज संभारे   
  बेटी विकास है माँ जननी का, बेटी भाई की सबल बांह 
  बेटी कौमुदी पिता श्री की, जो देता शीतल बट की छाँह   
  
  बेटी ऐसी कृति,माँ जिसमें सदा रूप अपना देखा करती है   
  बेटी ऐसी कृति,माँ जिसमें निज स्वप्न संजोये धरती है   
  बेटी ऐसी कृति,माँ जिसमें अपनी,साँसें संभाल रखती है  
  बेटी ऐसी कृति,माँ जिसमें,जग का सारा दुलार भरती है  

  बिन बेटी के माँ, बिना माँ के बेटी,सदा अधूरी रहती है   
  बेटी की घर से विदा सदा हर माँ की मजबूरी रहती है 
  माँ की आकांक्षायें आत्मसात कर बेटी फलीभूत करती है   
  बेटी माँ के सुखदा आँचल में जीवन भर खुशियां भरती है   
   
    श्रीप्रकाश शुक्ल 

Monday, 16 December 2013

आज अचानक सूनी- सी संध्या में

आज अचानक सूनी- सी संध्या में, आकर कोई कहता है  
क्यों उदास आकुल बैठा तू, खोया सा क्यों रहता है  
कोई नहीं दिखा धरती पर जिसने वियोग का दुःख न पाया   
जिसने अतीत की सुधियों में,खोकर अपना मन ना दुखाया  

हो सकता ये सत्य कथन हो, पर भूलूं कैसे वो घड़ियाँ  
सुख की सौगातों सी थीं जब अधरों से झरती फुलझड़ियाँ  
कितने राग भरे पल थे वो, थीं कितनी मृदुल मुलाकातें 
कितने मीठे से सपने थे, कितनीं प्यारी मन हर बातें  

वो आँचल का छोर कि जिसमें, तुमने आँसू छलकाये थे   
वो अपना संसार कि जिस पर,  हम दोनों  इतराये थे  
सहमे पद चाप भरीं गलियां वो नहीं भुलायी जातीं हैं  
सांझे जो गुजरी साथ साथ, सोये अरमान जगातीं है 

अब तो केवल यही शेष है, जब भी मचले पीर ह्रदय की  
तोड़ कल्पना की सीमायें, रचूँ अल्पना मधुर प्रणय की  
जब अनुभूति विकल हो इतनी, सूना सब संसार लगे  
गीत व्यथा के हंस हंस गाऊं,शायद चित उल्लास जगे   

  श्रीप्रकाश शुक्ल 


आज अचानक सूनी-सी संध्या में

आज अचानक सूनी-सी संध्या में, यों खयाल आया मन में  
जो अपने थे दूर हुए क्यों, पतझर सा  छागया चमन में  

हम रोज देखते हैं चंदा से होते दूर सितारे नभ में   
पर नहीं छोड़ते साथ सितारे, जब भी चंदा फंसे ग्रहन में   

जिन कोमल पत्तों को हमने, पाला था पलकों में ढककर 
छोड़ स्वजन, किस सुख की खातिर, लिप्त हुए वो धन अर्जन में 

सम्भव नहीं भुला पायें वो, थके हुए जर्जर खम्बों को 
जिनकी महज़ छुवन काफी थी, उर में उठते दर्द दमन में 

अब तो उचित यही है " श्री "खुद को  ही दोषी मानें हम    
कैसे हम अनविज्ञ  रहे, क्या  होते परिणाम प्रलोभन में       

श्रीप्रकाश शुक्ल 

मेरा तो स्पर्श मात्र है 

मेरे सपनों  की  दुनियां में  
तुम अब भी आ ही जाती हो 
छूकर मुझको बार बार  
सोये अहसास जगाती  हो 

कहती, मेरा तो स्पर्श मात्र है 
फिर क्यूँ बढ़ जाती है सिहरन  ?
नच उठता मन मयूर उन्मादित  
जैसे  घिर आया पागलपन 

मन.आकुल हो जाता चिंतित, 
कैसे तुमको बहुल प्रेम दे 
जीवन के सारे सुख साधन 
लाकर आँचल में उड़ेल दे   

मेरा तो बस स्पर्श मात्र है 
यदि हाँ, तो क्यों ऐसा कंपन ?
श्वासों का प्रवाह हो गतिमय 
संयम क्यों खो देता तन मन 

उर्जस्वित हो जाता रोम रोम 
चाहे, उड़कर नभ को छू लूं 
हृद सागर तेरे नेह भरा जो, 
भर एक घूँट ,सारा पी लूं 

मुझको तेरा स्पर्श, एक 
अद्भुत मणि सा लगता है 
जो तन के हर अवयव को 
उद्वेलित कर, मद भरता है 

रूह विकल होती मिलने को 
बेताबी तड़पन में ढलती 
रीते मन की  बेज़ारी में   
रात मदभरी नहीं संभलती  

सच पूछो स्पर्श तेरे ये 
रतिवर के ही पुष्पवाण हैं  
बड़वा सी आवेशित करते
जलते जिसमें मेरे प्राण हैं 

श्रीप्रकाश शुक्ल 
मेरा तो स्पर्श मात्र है

मेरा तो स्पर्श मात्र है, जो करता प्रभु ही करता 
सारे जग का मालिक वो है, वही है करता धरता   

जिसकी भृकुटि विलास सृष्टि का लय कर देती 
सुन भक्तों की टेर दौड़ कर आता, दुःख हरता  

 तू  माने या ना माने, उसको तो सब ही प्रिय हैं 
सबका खैर ख्वाह मौला वो,अल्ला,यीशु, भरता  

नहीं किसी के पाप पुण्य से उसको लेना देना 
डूबा रहे ज्ञान जब तम में मति भ्रम से मन मरता   

जो अपने कर्मों की "श्री" पतवार संभाले रहता खुद  
जीवन नौका खे कर अपनी हंस हंस पार उतरता 

श्रीप्रकाश शुक्ल